Ranchi: झारखंड हाईकोर्ट के अधिवक्ता महेश तिवारी की सजा पर रोक लगाने की मांग वाली याचिका पर सभी पक्षों को सुनने के बाद न्यायाधीश रोगोंन मुखोपाध्याय की अदालत ने फैसला सुरक्षित रख लिया है. इस मामले में विजन हॉस्पिटैलिटी की ओर से वरीय अधिवक्ता इंद्रजीत सिन्हा एवं अधिवक्ता चंचल जैन ने पक्ष रखा. फिलहाल अदालत याचिका की मेंटेनेबिलिटी (सुनवाई योग्य होने) के प्रश्न पर विचार कर रही है. अदालत का फैसला यह तय करेगा कि अधिवक्ता महेश तिवारी की याचिका सुनवाई योग्य है या नहीं.
दोनों पक्षों ने रखे अपने-अपने तर्क
आज चली लंबी बहस के दौरान अधिवक्ता महेश तिवारी ने अपना पक्ष स्वयं रखा. वहीं, प्रतिवादी पक्ष की ओर से अधिवक्ता अभय कुमार मिश्रा ने तर्क दिया कि महेश तिवारी को सुनाई गई सजा अंतरिम आदेश के रूप में दी गई है, जिसे दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 482 के तहत चुनौती दी जा सकती है. ऐसे में मामले की प्रकृति के अनुसार क्रिमिनल रिवीजन याचिका सुनवाई योग्य नहीं है. हालांकि अदालत ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया.

क्या है पूरा मामला
दरअसल, डोरंडा थाना कांड संख्या 191/2012 से जुड़े मामले में न्यायिक दंडाधिकारी प्रथम श्रेणी की अदालत ने 30 मार्च 2026 को अधिवक्ता महेश तिवारी को भारतीय दंड संहिता (IPC) की विभिन्न धाराओं 341, 323, 354, 504 और 506 के तहत दोषी ठहराया था. अदालत ने उन्हें अलग-अलग धाराओं में सजा सुनाई, जिसमें धारा 354 के तहत दो वर्ष के सश्रम कारावास और जुर्माने की सजा भी शामिल है.


