न्यूज़ वेव डेस्क
मोबाइल हाथ में आते ही बच्चे वीडियो, गेम और सोशल मीडिया की दुनिया में तेजी से कदम रख रहे हैं. इसी बदलती डिजिटल आदत को देखते हुए अब भारत में बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर बड़ा कदम उठाने की तैयारी दिखाई दे रही है. संसद के मानसून सत्र में एक ऐसा निजी विधेयक पेश किया गया है, जो 13 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेमिंग अकाउंट्स पर सख्त नियम लागू करने की बात करता है.इस प्रस्ताव का नाम ‘सेफगार्डिंग हेल्थी इंटरनेट एनवायरनमेंट फॉर लिटिल डिजिटल नेटिव्स (SHIELD) बिल, 2025’ रखा गया है. आसान शब्दों में कहें तो इसका मकसद बच्चों के लिए इंटरनेट को कम जोखिम भरा बनाना है.

बिना मां-बाप की मंजूरी अकाउंट नहीं
बिल में कहा गया है कि 13 वर्ष से कम उम्र का बच्चा सोशल मीडिया या ऑनलाइन गेमिंग प्लेटफॉर्म पर अपना अकाउंट तभी बना सकेगा, जब माता-पिता या अभिभावक की अनुमति और पहचान सत्यापन पूरा हो. यानी केवल उम्र लिख देना पर्याप्त नहीं होगा, प्लेटफॉर्म को वास्तविक उम्र की जांच करनी पड़ सकती है.

बच्चों को विज्ञापनों का निशाना बनाने पर रोक
प्रस्ताव में यह भी कहा गया है कि नाबालिगों की ऑनलाइन गतिविधियों को ट्रैक कर उन्हें विज्ञापन दिखाने या उनकी प्रोफाइलिंग करने पर रोक लगाई जाए. लंबे समय से विशेषज्ञ यह चिंता जताते रहे हैं कि बच्चों का डेटा इकट्ठा कर उन्हें खास तरह का कंटेंट दिखाया जाता है, जिसका असर उनके व्यवहार और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ सकता है.

18 साल तक अलग सुरक्षा नियम
SHIELD बिल में 18 वर्ष से कम उम्र के सभी युवाओं को ‘बच्चा’ माना गया है. इसके तहत सोशल मीडिया कंपनियों, गेमिंग ऐप्स और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म को बच्चों के लिए अलग सुरक्षा मानक लागू करने होंगे. यानी वही नियम सब पर लागू नहीं होंगे जो वयस्कों पर लागू होते हैं.
माता-पिता के लिए कंट्रोल डैशबोर्ड
इस प्रस्ताव का सबसे दिलचस्प हिस्सा पैरेंट कंट्रोल सिस्टम है. बिल के अनुसार कंपनियों को ऐसा डैशबोर्ड देना पड़ सकता है, जिससे अभिभावक बच्चे की ऑनलाइन गतिविधि देख सकें. वे स्क्रीन टाइम सीमित कर सकेंगे, कुछ ऐप या सेवाएं बंद कर सकेंगे और प्राइवेसी सेटिंग्स बदल सकेंगे.
दुनिया से सीखने की कोशिश
ऑस्ट्रेलिया सहित कई देशों ने बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग पर कड़े नियम बनाने की दिशा में कदम उठाए हैं. भारत में आया यह प्रस्ताव भी उसी बहस का हिस्सा माना जा रहा है कि डिजिटल दुनिया में बच्चों की सुरक्षा की जिम्मेदारी केवल परिवार की नहीं, बल्कि टेक कंपनियों और सरकार की भी है.
अभी कानून नहीं बना है
महत्वपूर्ण बात यह है कि यह फिलहाल एक प्रस्तावित निजी विधेयक है. संसद में इस पर चर्चा, संशोधन और आगे की प्रक्रिया के बाद ही यह तय होगा कि इसे कानून का रूप मिलेगा या नहीं. लेकिन इतना साफ है कि बच्चों के मोबाइल और सोशल मीडिया इस्तेमाल को लेकर देश में नई बहस शुरू हो चुकी है. अगर यह कानून बनता है तो भारत में पहली बार बच्चों की डिजिटल उम्र, सोशल मीडिया पहुंच और ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर एक व्यवस्थित कानूनी ढांचा तैयार हो सकता है.
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