पेड़ के नीचे भविष्य गढ़ते 130 बच्चे: सावडीह स्कूल की दर्दनाक तस्वीर ने खोली शिक्षा व्यवस्था की पोल

Sonahatu: एक ओर सरकार “हर बच्चे को बेहतर शिक्षा” का सपना दिखा रही है, वहीं दूसरी ओर सोनाहातू प्रखंड के चोकाहातु पंचायत...

Sonahatu
पेड़ के नीचे बैठकर पढ़ाई करते बच्चे

Sonahatu: एक ओर सरकार “हर बच्चे को बेहतर शिक्षा” का सपना दिखा रही है, वहीं दूसरी ओर सोनाहातू प्रखंड के चोकाहातु पंचायत स्थित राजकीयकृत मध्य विद्यालय, सावडीह की तस्वीर उस सपने को चकनाचूर करती नजर आ रही है. यहां बच्चे किताबों से कम, किस्मत से ज्यादा लड़ रहे हैं. विद्यालय की हालत ऐसी हो चुकी है कि जर्जर भवन अब शिक्षा का मंदिर नहीं, बल्कि हादसे का इंतजार करता खंडहर बन गया है. डर इस कदर है कि शिक्षक खुद बच्चों को कक्षाओं के भीतर बैठाने से घबराते हैं. मजबूरी में बरामदे और बरगद के विशाल पेड़ के नीचे ही पढ़ाई कराई जा रही है.

बच्चे जमीन पर बोरे पर बैठकर करते हैं पढ़ाई

सुबह की प्रार्थना के बाद बच्चे जमीन पर बोरा बिछाकर बैठ जाते हैं. कोई धूप से आंखें बचाता है, तो कोई उड़ती धूल में कॉपी संभालता नजर आता है. अचानक बारिश हो जाए तो पूरा स्कूल तितर-बितर हो जाता है. किताबें भीगती हैं, बच्चे भागते हैं और पढ़ाई वहीं खत्म हो जाती है. गर्मी में पेड़ की छांव भी जवाब दे देती है. कई छोटे बच्चे चक्कर आने और सिरदर्द की शिकायत करते हैं. बावजूद इसके, कक्षा 1 से 8 तक के करीब 130 बच्चे रोज स्कूल पहुंचते हैं, क्योंकि उनके सपने अब भी जिंदा हैं. लेकिन सबसे दर्दनाक स्थिति छात्राओं की है. विद्यालय का शौचालय जर्जर और अनुपयोगी हो चुका है. बेटियां पूरे दिन पानी कम पीकर खुद को रोकने को मजबूर हैं. कई छात्राएं इसी कारण स्कूल आना छोड़ने लगी हैं. शिक्षा के साथ उनकी गरिमा भी टूट रही है.

अब तक सिर्फ मिला आश्वासन

विद्यालय के सहायक शिक्षक सागर मंडल ने भावुक अपील करते हुए कहा कि “हम बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं, लेकिन बिना भवन और बुनियादी सुविधा के शिक्षा देना अब संघर्ष बन चुका है. पेड़ के नीचे भविष्य नहीं बनता, बच्चों को सुरक्षित छत चाहिए.” ग्रामीणों का कहना है कि कई बार विभागीय अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को समस्या से अवगत कराया गया, लेकिन अब तक सिर्फ आश्वासन ही मिला. सवाल यह उठता है कि क्या किसी बड़े हादसे के बाद ही प्रशासन जागेगा?

सावडीह के मासूम बच्चे आज भी आसमान की ओर देखकर पढ़ रहे हैं. शायद उन्हें उम्मीद है कि किसी दिन उनके सिर पर भी एक मजबूत छत होगी, जहां बारिश डर नहीं बनेगी और धूप पढ़ाई की दुश्मन नहीं होगी. अब देखना यह है कि सरकार और प्रशासन इन 130 बच्चों की पुकार सुनते हैं या फिर शिक्षा व्यवस्था का यह दर्द यूं ही पेड़ की छांव में दम तोड़ता रहेगा.

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