हाथियों के आतंक से राहत दिलाने के लिए हजारीबाग में बन रहा हाथी ट्रांजिट एंड ट्रीटमेंट सेंटर अब पर्यावरणीय सवालों के घेरे में – News Wave Jharkhand

Hazaribagh : हाथियों के आतंक से राहत दिलाने के लिए टाटीझरिया के महलोनिया में बनाया जा रहा हाथी ट्रांजिट एंड ट्रीटमेंट सेंटर...

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Hazaribagh : हाथियों के आतंक से राहत दिलाने के लिए टाटीझरिया के महलोनिया में बनाया जा रहा हाथी ट्रांजिट एंड ट्रीटमेंट सेंटर अब पर्यावरणीय सवालों के घेरे में आ गया है. झरपो-पेटो मार्ग स्थित करीब 20 एकड़ वन क्षेत्र में निर्माण के लिए बड़े पैमाने पर हरे-भरे पेड़ों की कटाई किए जाने का मामला सामने आया है. ग्रामीणों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों का आरोप है कि हाथियों से बचाव और उनके संरक्षण के नाम पर उसी जंगल को उजाड़ा जा रहा है, जिसे वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास माना जाता है.

हाथियों से राहत की उम्मीद, लेकिन जंगल की कीमत पर क्यों?

स्थानीय लोगों का कहना है कि हाथी प्रभावित क्षेत्र में ट्रांजिट एंड ट्रीटमेंट सेंटर की जरूरत से उन्हें कोई आपत्ति नहीं है. वर्षों से हाथियों के झुंड फसलों को नुकसान पहुंचाते रहे हैं और कई बार ग्रामीणों की जान पर भी खतरा मंडराता रहा है. ऐसे में प्रशिक्षित कर्मियों, विशेषज्ञों और कुमकी हाथियों से लैस सेंटर से राहत की उम्मीद है. लेकिन ग्रामीणों का सवाल है कि वन्यजीव संरक्षण की परियोजना के लिए वन क्षेत्र की हरियाली ही खत्म कर दी जाए तो इसका औचित्य क्या है?

ग्राम सभा को विश्वास में नहीं लेने का आरोप

उपप्रमुख रवि वर्णवाल, झामुमो प्रखंड अध्यक्ष रवि सिंह और मुखिया शिबू सोनी ने निर्माण प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि विकास और हाथी प्रबंधन के नाम पर हरे पेड़ों की अंधाधुंध कटाई स्वीकार नहीं की जा सकती. उनका आरोप है कि निर्माण से पहले स्थानीय ग्राम सभा और ग्रामीणों को विश्वास में नहीं लिया गया. जनप्रतिनिधियों का कहना है कि स्थानीय लोगों को प्रक्रिया से दूर रखकर निर्माण कार्य शुरू किए जाने से पारदर्शिता पर सवाल खड़े होते हैं. उन्होंने पूरे मामले की जांच की मांग की है.

हिंसक हाथियों को नियंत्रित करेंगे प्रशिक्षित कुमकी हाथी

प्रस्तावित सेंटर में हिंसक हाथियों को नियंत्रित करने, रास्ता भटके हाथियों को सुरक्षित रूप से जंगल तक पहुंचाने और कुएं या अन्य स्थानों में फंसे हाथियों के रेस्क्यू की व्यवस्था होगी. आक्रामक नर हाथियों को नियंत्रित करने के लिए प्रशिक्षित मादा कुमकी हाथियों के इस्तेमाल की भी योजना है. सेंटर के चारों ओर सुरक्षा ट्रेंच, कर्मचारियों और विशेषज्ञों के लिए भवन और हाथियों के लिए पानी की व्यवस्था को लेकर चेकडैम का निर्माण भी कराया जा रहा है.

हाथियों के आश्रय में ही कट रहे उनके घर के पेड़

परियोजना की सबसे बड़ी विडंबना यही बताई जा रही है कि हाथियों के लिए सुरक्षित व्यवस्था तैयार करने के दौरान उनके प्राकृतिक आवास की हरियाली कम की जा रही है. जंगल सिर्फ पेड़ों का समूह नहीं, बल्कि हाथियों सहित अनेक वन्यजीवों का प्राकृतिक घर है. ग्रामीणों का कहना है कि यदि बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई जारी रही तो इसका असर आने वाले वर्षों में वन्यजीवों के आवास, जैव विविधता और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ सकता है. हाथियों के लिए सुरक्षित क्षेत्र तैयार करने के बजाय उनके प्राकृतिक विचरण क्षेत्र को सीमित करना भविष्य में मानव-हाथी संघर्ष को और बढ़ा सकता है.

पुराने पौधरोपण कार्यों पर भी उठे सवाल

जनप्रतिनिधियों ने क्षेत्र में पूर्व में कराए गए वनरोपण कार्यों में भी कथित अनियमितता का आरोप लगाया है. उनका कहना है कि सरकारी राशि खर्च होने के बावजूद जमीन पर पौधरोपण और पौधों के संरक्षण का अपेक्षित परिणाम नजर नहीं आता. उन्होंने मांग की है कि पूर्व के वनरोपण कार्यों की भी जांच कराई जाए और यदि कहीं सरकारी राशि के दुरुपयोग या लापरवाही की पुष्टि होती है तो जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की जाए.

सेंटर बने, लेकिन जंगल की कीमत पर नहीं

ग्रामीणों का कहना है कि वे सेंटर के विरोध में नहीं हैं. उनकी मांग सिर्फ इतनी है कि हाथियों से राहत और जान-माल की सुरक्षा के साथ जंगल और पर्यावरण की भी सुरक्षा सुनिश्चित हो. ग्रामीणों ने कहा कि हाथी बचाने के नाम पर जंगल की बलि नहीं दी जानी चाहिए. यदि पेड़ों की कटाई अपरिहार्य है तो इसकी पूरी जानकारी सार्वजनिक की जाए, वैज्ञानिक आधार बताया जाए और स्थानीय लोगों को प्रक्रिया में शामिल किया जाए.

कागज पर नहीं, जमीन पर दिखे भरपाई का वनरोपण

ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों ने मांग की कि जितने पेड़ काटे जा रहे हैं, उनकी भरपाई के लिए केवल कागजी पौधरोपण नहीं, बल्कि जमीन पर दिखाई देने वाला दीर्घकालिक वनरोपण कराया जाए. लगाए गए पौधों के संरक्षण और उनके जीवित रहने की नियमित निगरानी भी सुनिश्चित हो. अब निगाहें वन विभाग और प्रशासन पर हैं कि हाथी संरक्षण की इस महत्वपूर्ण परियोजना में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन कैसे कायम किया जाता है और पेड़ों की कटाई को लेकर उठे सवालों की जांच होती है या नहीं.

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