झारखंड: नौ दिन में 49 इनामी नक्सलियों से निपटने की चुनौती,क्या 31 मार्च की डेडलाइन बढ़ेगी?

SAURAV SINGH रांची: भारत सरकार द्वारा देश को माओवाद मुक्त करने के लिए निर्धारित की गई 31 मार्च की समय सीमा अब...

SAURAV SINGH

रांची: भारत सरकार द्वारा देश को माओवाद मुक्त करने के लिए निर्धारित की गई 31 मार्च की समय सीमा अब बेहद करीब है. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के इस लक्ष्य को पूरा करने में अब महज 9 दिन शेष रह गए हैं, लेकिन झारखंड की भौगोलिक परिस्थितियों और माओवादियों की मौजूदगी को देखते हुए यह चुनौती अभी भी बरकरार है. राज्य में अभी भी 49 हार्डकोर माओवादी सुरक्षा बलों के रडार पर हैं, जिनसे निपटना एक बड़ी चुनौती बनी हुई है.

नौ दिन में इन 49 इनामी नक्सलियों से निपटने की चुनौती:

एक करोड़ के दो इनामी नक्सली :

– मिसिर बेसरा
– असीम मंडल

25 लाख के दो इनामी नक्सली :

– ब्रजेश गंझु
– अजय महतो

15 लाख के आठ इनामी नक्सली:

– मोछू उर्फ मेहनत
– मदन महतो
– संजय महतो
– रामप्रसाद मारडी
– नितेश यादव
– रवीन्द्र गंझु
– बेला सरकार
– सहदेव महतो

10 लाख के आठ इनामी नक्सली:

– आरिफ जी
– मनोहर गंझु
– सलूका कायम
– पुष्पा महतो
– गोदराय यादव
– अमृत होरो
– चंदन लोहरा
– रंजीत गंझू

पांच लाख के 17 इनामी नक्सली:

– अनिल तुरी
– सुखलाल बिरजिया
– समीर सोरेन
– समीर महतो
– सुलेमान हांसदा
– सचिन बेंग
– गुलशन सिंह मुंडा
– जयंती
– प्रभात मुंडा
– पंकज कोरबा
– बिरेन सिंह
– सागेन अंगेरिया
– मिता
– मीणा
– राज भुइयां
– रामदेव लोहरा
– मीणा

दो लाख के चार इनामी नक्सली:

– करण
– मालती मुर्मू
– सोनाराम उर्फ सुदेश
– बलराम लोहरा

एक लाख के छह इनामी नक्सली:

– इसराइल
– बासु पूर्ति
– बासमती जेराई
– सामएल बुध
– फुलमनी कोड़ा
– चोगो पूर्ति

सारंडा में आर-पार की जंग:

वर्तमान में सुरक्षा बलों का सबसे बड़ा ऑपरेशन पश्चिमी सिंहभूम जिले के सारंडा वन क्षेत्र में चल रहा है.इसे माओवाद के खिलाफ अंतिम लड़ाई माना जा रहा है. सीआरपीएफ, कोबरा, झारखंड जगुआर और जिला पुलिस के जवान मिलकर मोर्चा संभाले हुए हैं.सुरक्षा बलों ने घने जंगलों के भीतर अपने अस्थाई कैंप स्थापित किए हैं. इसका मुख्य उद्देश्य माओवादियों की ‘सप्लाई चेन को काटना है. उनके गोला-बारूद, रसद और संचार के साधनों को पूरी तरह ठप करने के प्रयास जारी हैं.

दो ही रास्ते बचे,सरेंडर या एनकाउंटर:

सुरक्षाबलों की जीरो टॉलरेंस नीति ने नक्सलियों को बैकफुट पर धकेल दिया है. 22 फरवरी से 31 मार्च के बीच का इन नौ बचे हुए दिन नक्सलियों के लिए निर्णायक साबित होने वाला है.अब उनके पास केवल दो ही विकल्प बचे हैं, पहला सरकार की पुनर्वास नीति का लाभ उठाकर मुख्यधारा में शामिल होना और दूसरा सुरक्षाबलों की कार्रवाई में मारे जाना.

झारखंड गठन से अबतक नक्सली हमले में 556 जवान शहीद:

– 2000: 03
– 2001: 44
– 2002: 77
– 2003: 19
– 2004: 36
– 2005: 28
– 2006: 48
– 2007: 08
– 2008: 38
– 2009: 71
– 2010: 25
– 2011: 29
– 2012: 25
– 2013: 26
– 2014: 14
– 2015: 05
– 2016: 08
– 2017: 04
– 2018: 10
– 2019: 13
– 2020: 02
– 2021: 06
– 2022: 02
– 2023: 05
– 2024: 03
– 2025: 07
– 2026: (अबतक) 00
– कुल: 556

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