असम में झारखंडी राजनीति का ट्रेलर, आमने-सामने JMM-कांग्रेस

रांची: असम विधानसभा चुनाव 2026 में इस बार त्रिकोणीय मुकाबला और भी दिलचस्प हो गया है. झारखंड में गठबंधन की सरकार चला...

रांची: असम विधानसभा चुनाव 2026 में इस बार त्रिकोणीय मुकाबला और भी दिलचस्प हो गया है. झारखंड में गठबंधन की सरकार चला रहे झामुमो और कांग्रेस असम की गलियों में एक-दूसरे के खिलाफ ताल ठोक रहे हैं. मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन खुद मोर्चे पर डटे हुए हैं. ताबड़तोड़ रैलियों के जरिए चाय जनजाति को साधने में जुटे हैं. असम का चुनाव झामुमो के लिए महज एक चुनावी मुकाबला नहीं, बल्कि अपनी राजनीतिक सीमाओं को लांघने का एक बड़ा प्रयोग है.

JMM की रणनीति: 21 सीटों पर ‘मिशन टी-गार्डन’

कांग्रेस के साथ गठबंधन की बातचीत विफल होने के बाद, झामुमो ने 21 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने का साहसिक फैसला लिया है. असम में लगभग 60-70 लाख लोग ‘चाय जनजाति’ से संबंध रखते हैं, जिनके पूर्वज छोटानागपुर यानी से वहां जाकर बसे थे. हेमंत सोरेन इसी भावनात्मक जुड़ाव को वोट में बदलने की कोशिश कर रहे हैं. सीएम हेमंत सोरेन ने अपनी रैलियों में चाय बागान श्रमिकों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिलाने का वादा किया है, जो वहां एक दशक पुराना और संवेदनशील मुद्दा है.

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झामुमो लड़ रहा अस्तित्व की लड़ाई

झामुमो खुद को केवल एक क्षेत्रीय दल तक सीमित न रखकर राष्ट्रीय आदिवासी आवाज के रूप में स्थापित करना चाहती है. वहीं झारखंड प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष केशव महतो कमलेश ने झामुमो के फैसले पर चिंता जताई है. कांग्रेस का मानना है कि झामुमो के अलग लड़ने से आदिवासी वोटों का बंटवारा होगा, जिसका सीधा फायदा भाजपा को मिल सकता है. जबकि कांग्रेस ने हमेशा झामुमो का अपमान किया है. उन्होंने यह भी याद दिलाया कि कैसे बिहार में भी कांग्रेस ने झामुमो को हाशिए पर रखा था.

हक की आवाज बुलंद करना: CM

सीएम हेमंत सोरेन का कहना है कि वे किसी को हराने नहीं, बल्कि अपने लोगों के हक की आवाज बुलंद करने आए हैं. जो भी हो, असम के चुनावी नतीजों और इस खींचतान का सीधा असर झारखंड की भविष्य की राजनीति पर पड़ना तय है. असम में गठबंधन न होना यह संकेत देता है कि झामुमो अब झारखंड में भी कांग्रेस के साथ सीटों के बंटवारे में अपर हैंड रखना चाहती है.

यदि झामुमो असम में कुछ सीटें जीतने या सम्मानजनक वोट शेयर पाने में सफल रहती है, तो हेमंत सोरेन देश के सबसे बड़े आदिवासी नेता के रूप में उभरेंगे, जिससे झारखंड में उनकी पकड़ और मजबूत होगी. पड़ोसी राज्यों में विस्तार से झामुमो कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा आएगी, जिसका लाभ उन्हें आगामी स्थानीय और संसदीय चुनावों में मिल सकता है.

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