झारखंड की डिजिटल सियासत : जमीन से कटी और एयरकंडीशंड कमरों के स्मार्टफोन में हो गई है कैद, दिनभर में चार तीखे ट्वीट दागना ही रह गया काम

Ravi Bharti Ranchi: झारखंड की राजनीति अब चौक-चौराहों और पसीने वाली जनसभाओं से निकलकर एयरकंडीशंड कमरों के स्मार्टफोन में कैद हो गई...

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Ranchi: झारखंड की राजनीति अब चौक-चौराहों और पसीने वाली जनसभाओं से निकलकर एयरकंडीशंड कमरों के स्मार्टफोन में कैद हो गई है. राज्य के सियासी सूरमाओं के लिए जनसेवा का मतलब अब जनता के बीच जाना नहीं, बल्कि दिन में चार तीखे ट्वीट दाग देना रह गया है. आलम यह है कि झारखंड की राजनीति अब जनमुद्दों से ज्यादा ट्रेंडिंग हैशटैग और रीट्वीट की संख्या पर टिकी है. “अब कार्यकर्ताओं की जरूरत भीड़ जुटाने के लिए नहीं, बल्कि साहब के ट्वीट को रिट्वीट कराने और कमेंट सेक्शन में विरोधियों को ट्रोल करने के लिए पड़ती है.

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ट्विटर बना नया कुरुक्षेत्र

कभी बिरसा मुंडा और सिदो-कान्हू की इस धरती पर राजनीति का मतलब ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर चलकर गांव के आखिरी व्यक्ति तक पहुंचना होता था. लेकिन आज के डिजिटल माननीय के लिए संघर्ष का अर्थ सिर्फ उंगलियों का व्यायाम है. विपक्ष को घेरना हो या सरकार की पीठ थपथपानी हो, सारा युद्ध स्तर का काम एक्स पर ही निपटा लिया जाता है. ऐसा लगता है मानो विधानसभा के सत्र से ज्यादा महत्वपूर्ण अब सोशल मीडिया के नोटिफिकेशन हो गए हैं.

फोटोजेनिक संघर्ष और हैशटैग वाली हमदर्दी

राज्य में कहीं कोई समस्या हो, तो नेता जी का पहला रिफ्लेक्स समाधान ढूंढना नहीं, बल्कि उस पर एक भावुक पोस्ट लिखकर अपनी फोटोजेनिक उपस्थिति दर्ज कराना होता है. जनता प्यासी है, सड़क टूटी है या बेरोजगारी चरम पर है, इन सबका हल अब धरातल पर कम और 15 से 20 शब्दों के तंज में ज्यादा खोजा जा रहा है. नेताओं के बीच मची इस होड़ ने राजनीति को एक कॉमेडी शो और प्रोपेगेंडा वॉर में तब्दील कर दिया है, जहां तीखे शब्द ही सबसे बड़ा हथियार मान लिए गए हैं.

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गायब होती मैदानी जंग

झारखंड की इस नई राजनीतिक संस्कृति में जमीनी पकड़ शब्द अब पुराना पड़ चुका है. अब पकड़ नेटवर्क पर देखी जाती है. जनता की समस्याओं पर सदन में बहस करने या सड़कों पर उतरकर पसीना बहाने के बजाय, नेताजी अपनी प्रोफाइल पिक्चर बदलने और ब्लू टिक की गरिमा बचाने में ज्यादा व्यस्त हैं. राजनीति का यह कीबोर्ड अवतार लोकतंत्र के लिए कितना सुखद है, यह तो आने वाला वक्त बताएगा, लेकिन फिलहाल तो झारखंड की सियासत मुट्ठी भर इंटरनेट डेटा में सिमटकर रह गई है.

बदलाव की जरूरत: ट्वीट नहीं, ट्रीटमेंट चाहिए

जनता अब इस डिजिटल नूरा-कुश्ती से ऊब चुकी है. उसे अपने प्रतिनिधि का चेहरा मोबाइल स्क्रीन पर नहीं, बल्कि अपने गांव की धूल भरी गलियों में चाहिए. जब तक राजनीति लॉग-इन और लॉग-आउट के घेरे से बाहर निकलकर सीधे संवाद तक नहीं पहुंचेगी, तब तक जनहित के मुद्दे सिर्फ ट्रेंड बनकर गायब होते रहेंगे. झारखंड के सियासी दिग्गजों को यह समझना होगा कि सरकारें और जनाधार लाइक और शेयर से नहीं, बल्कि लोगों के बीच रहने और उनके आंसू पोंछने से बनता है. वरना, यह डिजिटल मोहमाया एक दिन डिलीट बटन की तरह उनके करियर को भी साफ कर सकती है.

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