Simdega: अक्सर सरकारी दफ्तरों के पीछे की जमीन झाड़ियों, पुराने रद्दी फाइलों के अंबार या कबाड़ के लिए जानी जाती है. लेकिन अगर आप सिमडेगा समाहरणालय आएं तो नजारा बिल्कुल अलग नजर आएगा. जिले की डीसी कंचन सिंह की दूरगामी सोच ने उस जमीन की तकदीर बदल दी है, जो कभी बंजर और उपेक्षित थी. आज यहां एक शानदार किचन गार्डन लहलहा रहा है, जो पूरे राज्य के प्रशासनिक गलियारों के लिए एक मिसाल बन गया है.
समाहरणालय परिसर में दिखा नया बदलाव
सिमडेगा समाहरणालय परिसर, जो कभी बंजर और बेकार पड़ा हुआ था, आज यहां न सिर्फ सुंदर फूलों से भरे गार्डन हैं, बल्कि समाहरणालय परिसर की बंजर जमीनों में कई तरह की खेती ने पूरे परिसर को हरा-भरा कर दिया है.
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डीसी की सोच और पहल बनी मिसाल
समाहरणालय किसी भी जिले का हृदय और आईना होता है. डीसी सिमडेगा ने एक दूरगामी सोच के साथ समाहरणालय परिसर की इस बेकार पड़ी जमीन पर खेती की संभावना तलाश की. कृषि कार्य करने वालों के साथ उन्होंने खुद भी खेतों में उतर कर रोपा रोपे.
दो एकड़ में लहलहाई फसलें
उनकी प्लानिंग और सूझबूझ का नतीजा है कि आज यहां लगभग दो एकड़ जमीन पर गेहूं, सरसों जैसी कई हरी फसलें लहलहा रही हैं. यह बदलाव बताता है कि विकास केवल बड़ी योजनाओं या भारी बजट का मोहताज नहीं होता.
सही सोच से बदली तस्वीर
सही नजरिया और नेतृत्व ही सबसे बड़ा संसाधन होता है. जिस जमीन को वर्षों तक बेकार समझा गया, उसी जमीन ने आज हरियाली की चादर ओढ़ ली है. यह परिवर्तन अपने आप में एक संदेश है और संसाधनों के सही इस्तेमाल का जीवंत उदाहरण भी है.
