Ranchi: झारखंड के विभिन्न जिलों में वेतन मद में हुई फर्जी निकासी के जिन्न ने अब प्रशासनिक महकमे में लेटर वॉर शुरू कर दिया है. बोकारो, हजारीबाग और राजधानी रांची में करोड़ों की अवैध निकासी को ट्रेजरी घोटाला बताए जाने पर झारखंड वित्त सेवा संघ ने ऐतराज जताया है. संघ ने वित्त मंत्री को पत्र लिखकर स्पष्ट किया है कि तिजोरी की चाबी नहीं, बल्कि कागजों की बुनियाद (डीडीओ स्तर) में खोट है.
कोषागार नहीं, डीडीओ की दहलीज पर गड़बड़ी
संघ ने तकनीकी दलीलों के साथ स्पष्ट किया है कि झारखंड ट्रेजरी कोड 2016 के तहत ड्रॉइंग एंड डिस्बर्सिंग ऑफिसर (डीडीओ) ही भुगतान का मास्टरमाइंड होता है. विपत्र तैयार करने से लेकर लाभुक का नाम, बैंक खाता और आईएफएससी कोड दर्ज करने की पूरी जिम्मेदारी संबंधित विभाग के डीडीओ की होती है. संघ का दावा है कि ट्रेजरी केवल एक चेकपोस्ट है, जो दस्तावेजों के मिलान के बाद भुगतान को हरी झंडी देता है.
निष्पक्ष जांच और जिम्मेदारी तय करने की अपील
वित्त सेवा संघ ने सरकार से मांग की है कि इस पूरे प्रकरण को कोषागार की विफलता के चश्मे से देखने के बजाय उन विभागों और अधिकारियों की भूमिका की गहन जांच की जाए, जहां से इन फर्जी बिलों की उत्पत्ति हुई. संघ के अनुसार, जब तक प्रत्येक स्तर पर डिजिटल जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक सिस्टम में ऐसी सेंधमारी को रोकना मुश्किल होगा. फिलहाल, संघ ने अब गेंद संबंधित विभागों के पाले में डाल दी है.
यह भी पढ़ें : शहादत को सम्मान : ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव के गौरव को सहेजने की उठी मांग, राज्यपाल को सौंपा 8 सूत्री मांग पत्र
संघ की ओर से स्पष्ट की गई ये बातें
• हस्तक्षेप की गुंजाइश नहीं: विपत्र का अंतिम डिजिटल अनुमोदन डीडीओ लॉगिन से ही होता है, जिसमें कोषागार कर्मियों की कोई भूमिका नहीं होती.
• फर्जी आंकड़ों का खेल: शुरुआती जांच का हवाला देते हुए संघ ने कहा कि विभागीय स्तर पर ही गलत विवरण और फर्जी नामों का सहारा लेकर बिल बनाए गए.
• छवि सुधार की मांग: अवैध निकासी को ट्रेजरी घोटाला कहना न केवल भ्रामक है, बल्कि इससे ईमानदार कोषागार कर्मियों की छवि धूमिल हो रही है.
