90s Nostalgia: याद हैं बचपन की ये 10 मासूम गलतफहमियां-क्या आप भी इन्हें सच मानते थे?

NEWS DESK: 90s के दौर में न तो हर बच्चे के पास स्मार्टफोन था और न ही इंटरनेट की सुविधा. उस समय...

NEWS DESK: 90s के दौर में न तो हर बच्चे के पास स्मार्टफोन था और न ही इंटरनेट की सुविधा. उस समय हमारी दुनिया गली-मोहल्ले, स्कूल के दोस्तों और टीवी पर आने वाले ‘शक्तिमान’ जैसे शोज तक ही सीमित थी.

उस मासूमियत भरे बचपन की सबसे खास बात वे ‘सफेद झूठ’ थे, जिन्हें हम पूरी ईमानदारी से सच मान बैठते थे. कभी मम्मी-पापा की डांट से बचने के अपने नियम होते थे, तो कभी दोस्तों के बीच फैली अफवाहें-इन सबने मिलकर हमारे बचपन को और भी मजेदार और यादगार बना दिया था.

आइए, 90 के दशक के उन 10 सबसे मजेदार ‘सफेद झूठों’ की याद ताजा करते हैं, जिन्हें बचपन में लगभग हर किसी ने कभी न कभी सच मान लिया था.

1. बीज निगलने पर पेट में पेड़ उगने का डर

संतरा, तरबूज या सेब खाते समय अगर गलती से बीज पेट में चला जाता, तो बच्चे घबरा जाते थे. बड़े अक्सर मजाक में कहते थे कि अब पेट के अंदर पेड़ उग आएगा और उसकी डालियां कान-नाक से बाहर निकलेंगी. यह बात कई बच्चों को सच लगती थी और वे डरकर रोने लग जाते थे.

2. चाय पी ली तो रंग काला हो जाएगा!

जब भी बच्चे चाय पीने की जिद करते थे, तो घरों में अक्सर यही बात सुनने को मिलती थी कि बच्चों को चाय नहीं पीनी चाहिए, इससे रंग काला पड़ जाता है. यह एक मासूम-सा सफेद झूठ था, जिसका मकसद बस इतना था कि बच्चे दूध पीने की आदत न छोड़ें.

3. लेटे हुए इंसान को लांघा तो उल्टे पैर लौटना जरूरी!

अगर कोई जमीन पर लेटा होता और बच्चे गलती से उसके ऊपर से गुजर जाते, तो बड़े तुरंत टोकते थे. उनका कहना होता था कि इससे उस व्यक्ति की लंबाई बढ़ना रुक जाती है. इस डर को दूर करने के लिए बच्चों को तुरंत उल्टे पैर वापस लौटने को कहा जाता था.

4. सिर टकरा गया तो फिर से टकराओ, नहीं तो कुत्ता काट लेगा

खेलते समय अगर दो बच्चों के सिर आपस में टकरा जाते थे, तो खेल वहीं रुक जाता था. फिर उन्हें दोबारा सिर टकराने को कहा जाता था, वरना डर रहता था कि अगले दिन कुत्ता काट लेगा. बचपन में यह बात कई बच्चों को सच लगती थी और वे तुरंत ऐसा कर भी लेते थे.

5. वीडियो गेम ज्यादा खेला तो टीवी की पिक्चर ट्यूब खराब हो जाएगी

मारियो और कॉन्ट्रा जैसे गेम खेलते समय जब बच्चे पूरी तरह मग्न हो जाते थे, तभी घर के बड़े कह देते थे कि वीडियो गेम बंद करो, नहीं तो टीवी की पिक्चर ट्यूब खराब हो जाएगी. यह बात अक्सर बच्चों को स्क्रीन से दूर रखने और टीवी को आराम देने के लिए कही जाती थी.

6. पेंसिल के छिलकों से बनती है रबर!

90s में यह बात हर बच्चे ने कभी न कभी सुनी ही थी. स्कूल में कोई ‘होशियार’ दोस्त बताता था कि पेंसिल की छीलन को दूध में उबालने से इरेज़र बन जाता है. इसके बाद ज्योमेट्री बॉक्स में छीलन इकट्ठा करना और घर जाकर कटोरी में उबालने की कोशिश करना कई बच्चों का पहला ‘साइंस एक्सपेरिमेंट’ बन गया, जो कभी सफल नहीं हुआ.

7. क्या सच में चाँद हमारे साथ चल रहा है?

रात में ट्रेन, बस या स्कूटर से सफर करते समय बच्चों को अक्सर ऐसा लगता था कि चाँद भी उनके साथ-साथ चल रहा है. चाहे जितनी भी दूरी तय कर लें, चाँद हमेशा साथ दिखाई देता था. यह नज़ारा बचपन में किसी जादू जैसा लगता था और बड़े भी मुस्कुराकर इसे और खास बना देते थे.

8. टूटा दांत छत पर फेंका तो चूहा नया दांत देगा

बचपन में दूध का दांत गिरते ही बच्चे उसे संभालकर रखते थे. बड़े-बुजुर्ग कहते थे कि उसे छत पर फेंक दो, रात में चूहा आएगा और बदले में एक नया, मजबूत दांत दे जाएगा. इस ‘कहानी’ पर बच्चे पूरा भरोसा कर लेते थे और छत की तरफ दौड़ पड़ते थे.

9. झूठ बोले तो कौवा काटे!

बचपन में यह लाइन सिर्फ एक गाना नहीं, बल्कि सच कबूल करवाने का तरीका बन जाती थी. जब किसी बात पर भरोसा नहीं होता था, तो दोस्त कसम खिलाते थे कि सच बोलो, वरना काला कौवा काट लेगा. डर की वजह से कई बार बच्चे तुरंत सच बोल देते थे.

10. काश वो बचपन फिर से लौट आए…

आज पीछे मुड़कर देखें तो बचपन के ये मासूम ‘झूठ’ चेहरे पर मुस्कान ले आते हैं. उस वक्त ये बातें हमारे लिए बिल्कुल सच जैसी थीं-चाहे चाँद का साथ चलना हो या दांत बदलने की कहानियां. आज भले ही ये सिर्फ यादें लगें, लेकिन कभी यही हमारी पूरी दुनिया हुआ करती थीं.

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