Vijay Kumar
सरायकेला : ईचागढ़-चांडिल क्षेत्र में लगातार बढ़ रहे मानव-हाथी संघर्ष और हर सप्ताह हो रही मौतों के बाद एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है – क्या वन विभाग का काम हाथियों को भगाना है?
संवेदनशील इकाई पर उठे सवाल:,हाथी प्रभावित क्षेत्रों में क्यों नहीं लगाया गया ,बोर्ड,?
वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग एक अत्यंत संवेदनशील इकाई के रूप में मानव जीवन के साथ ही वन्य जीवों की सुरक्षा हेतु सतत सक्रिय रहा है. परन्तु बीते कई सालों से मानव-हाथी संघर्ष में बढ़ोतरी होना और उसके लिए सीधे वन विभाग को जिम्मेदार मानना कहाँ तक तर्कसंगत है, यह आज यक्ष प्रश्न बनकर हम सब के बीच खड़ा है. रेड जून गांव के आवाजाही जगह का चिन्हित करके उक्त गांव के सीमा पर हाथी बहुल क्षेत्र हे.उक्त जगह पर बोर्ड लगा देना चाहिए ,जिसे आम लोगों पता चलेगा यह जगह हाथी प्रभावित हे.
विभागीय दिशा-निर्देश और वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 की मानें तो किसी भी वन्य जीव के प्राकृतिक क्रियाकलाप के साथ किसी भी प्रकार का छेड़छाड़ करना सरासर दंडनीय अपराध है. हाथियों को पटाखे, मशाल या शोर से खदेड़ना भी ‘हैरेसमेंट’ की श्रेणी में आता है.
कार्यशैली पर प्रश्नचिन्ह..? चूंकि हाल के दिनों में लगातार हो रही मानव-हाथी संघर्ष की घटनाओं ने वन विभाग की कार्यशैली पर प्रश्नचिन्ह खड़ा किया है कि आखिर इतनी सारी घटनाओं के बाद भी वन विभाग क्यों मौन है? ग्रामीण पूछ रहे हैं कि जब हाथी गांव में घुस रहे हैं तो विभाग सिर्फ भगाने आता है, स्थायी समाधान क्यों नहीं करता?
संरक्षण का दायित्व, छेड़खानी का अधिकार नहीं ..? गहन अध्ययन और जांच-पड़ताल के बाद यह पाया गया कि हाथियों के संरक्षण का दायित्व वन विभाग को दिया गया है, न कि उनके साथ किसी प्रकार की छेड़खानी या दुर्व्यवहार करने का अधिकार किसी भी अधिकारी को दिया गया है.
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दुविधा में अधिकारी ..? ऐसे में वन विभाग के अधिकारियों को दुर्भाग्यवश दोहरी मार झेलनी पड़ रही है. एक तरफ कानून हाथियों को छेड़ने से रोकता है, दूसरी तरफ जनाक्रोश उन्हें भगाने पर मजबूर करता है. अगर नहीं भगाते तो मौत का जिम्मेदार, और भगाते हैं तो वन्य जीव अधिनियम का उल्लंघन.
विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ हाथी भगाना समाधान नहीं. दलमा कॉरिडोर बहाल करना, अवैध खनन रोकना, जंगल में पानी-भोजन की व्यवस्था, सोलर फेंसिंग और ग्रामीणों को जागरूक करना ही स्थायी रास्ता है. जब तक हाथी का घर सुरक्षित नहीं होगा, संघर्ष नहीं रुकेगा. वन विभाग का काम संरक्षण है, भगाना मजबूरी.
