आईईडी विस्फोट ने छीना परिवार का सहारा, वन पत्तों के सहारे पल रहे पांच मासूमों के सिर से उठा पिता का साया.

चाईबासा: जिले के घने जंगलों से एक ऐसी मर्मस्पर्शी कहानी सामने आई है, जिसने मानवीय संवेदनाओं को झकझोर कर रख दिया है....

चाईबासा: जिले के घने जंगलों से एक ऐसी मर्मस्पर्शी कहानी सामने आई है, जिसने मानवीय संवेदनाओं को झकझोर कर रख दिया है. माओवादियों द्वारा बिछाए गए आईईडी ने न केवल एक मेहनतकश ग्रामीण की जान ले ली, बल्कि एक हंसते-खेलते परिवार को अंधेरे में धकेल दिया है. जयसिंह चेरवा, जो कभी अपने परिवार की ढाल थे, अब केवल यादों में शेष हैं.

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11 फरवरी का खौफनाक मंजर, आईईडी बलास्ट में चली गई जान:

बीती 11 फरवरी को जयसिंह चेरवा अपनी पत्नी और गोद में एक नन्ही दूधमुंही बच्ची को लेकर जंगल की ओर निकले थे. उनका इरादा केवल इतना था कि जंगल से पत्ते तोड़कर लाएंगे, उन्हें बेचेंगे और शाम को बच्चों के लिए दो वक्त की रोटी का इंतजाम करेंगे.लेकिन उन्हें क्या पता था कि नक्सलियों ने वहां मौत का सामान बिछा रखा है. जंगल के बीच अचानक एक जोरदार धमाका हुआ.माओवादियों द्वारा लगाए गए आईईडी की चपेट में जयसिंह सीधे तौर पर आ गए. धमाका इतना शक्तिशाली था कि जयसिंह को संभलने का मौका तक नहीं मिला और उन्होंने मौके पर ही दम तोड़ दिया.उनकी पत्नी और नन्ही बच्ची चमत्कारिक रूप से बच तो गईं, लेकिन उन्होंने अपनी आंखों के सामने अपने सुहाग और पिता को खोते देखा.

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खुशहाल जिंदगी पर मातम का साया:

जयसिंह चेरवा का जीवन रोज कमाओ-रोज खाओ वाला था, लेकिन उनके हौसले बड़े थे। वे पत्तों को बेचकर जो भी कमाते, उससे अपने पांच बच्चों की शिक्षा और बेहतर भविष्य के सपने बुनते थे.आज उस घर में सन्नाटा पसरा है. पांच मासूम बच्चे, जिन्हें शायद अभी मौत का मतलब भी ठीक से नहीं पता, अपनी मां की पथराई आंखों को देख रहे हैं.

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