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पोस्टमार्टम कांग्रेस का: कमेटी में इस बार जो हुआ उसमें फॉल्ट ही फॉल्ट, जगजाहिर हुई शीर्ष नेताओं की ढीली पकड़ और आपस में भिड़ंत (2)

Akshay Kumar Jha Ranchi : एक व्यक्ति एक पद के फॉर्मूले पर काम करने का दावा करने वाली कांग्रेस अपने ही कायदों...

Akshay Kumar Jha 

Ranchi : एक व्यक्ति एक पद के फॉर्मूले पर काम करने का दावा करने वाली कांग्रेस अपने ही कायदों को भूलती नजर आ रही है. झारखंड में कई ऐसे कांग्रेसी हैं जिनके पास एक से ज्यादा पद हैं. झारखंड 81 विधानसभा वाला राज्य है. जिसमें कांग्रेस तीसरी सबसे बड़ी पार्टी है. कांग्रेस के 16 विधायक हैं. 81 विधानसभा वाले राज्य में कांग्रेस की कमेटी में 350 सदस्य होना ही अपने आप में एक सवाल है. आखिर ऐसी क्या मजबूरी थी कि पार्टी के आला नेता सभी को खुश करने में लग गए. लेकिन, कांग्रेस के पदाधिकारी भूल गए कि किसी एक पार्टी में सभी को खुश करना काफी मुश्किल होता है. उसी का नतीजा मंत्री राधाकृष्ण किशोर के बेटे का सचिव पद से इस्तीफा देना है.

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पिछली कमेटी में थी सख्ती, विधायक, सांसद और शीर्ष पदाधिकारियों को नहीं मिली थी जगह

कांग्रेस के ही कुछ पुराने कार्यकर्ताओं का कहना है कि पिछली बार की कमेटी इस बार की कमेटी से लाख गुना अच्छी थी. दरअसल पिछली बार कमेटी में किसी विधायक, सांसद, केंद्रीय स्तर के पदाधिकारी या वैसे लोग जिन्हें दूसरी कोई अहम जिम्मेदारी मिली है, उन्हें कमेटी में नहीं रखा गया था. लेकिन इस बार सारे नियमों को ताक पर रखते हुए, जो पहले से किसी पद पर हैं, उन्हें भी कमेटी में अच्छे पद से नवाज दिया गया है.

  • सारे नियमों को ताक पर रखते हुए गुंजन सिंह जो राष्ट्रीय महिला कांग्रेस की महासचिव हैं, उन्हें भी उपाध्यक्ष बना दिया गया. राष्ट्रीय महिला कांग्रेस का महासचिव एक राष्ट्रीय स्तर का पद है. ऐसे में अब गुंजन सिंह राष्ट्रीय स्तर पर काम करेंगी या राज्य स्तर पर. कांग्रेस की गाइडलाइन की माने तो केंद्रीय स्तर के पदाधिकारी को विशेष आमंत्रण के जरिए पीसीसी कमेटी में रखा जा सकता है, ना कि सदस्य बनाकर.
  • राजेश कच्छप एक विधायक हैं और साथ ही विधानसभा में कांग्रेस की तरफ से पार्टी के उपनेता भी. लेकिन उन्हें फिर से उपाध्यक्ष के पद से नवाजा गया है.
  • जयमंगल उर्फ अनुप सिंह बेरमो के विधायक होने के साथ-साथ पार्टी की तरफ से सदन में मुख्य सचेतक हैं. लेकिन उन्हें भी पार्टी में उपाध्यक्ष बना दिया गया है.
  • सुरेश बैठा भी विधायक हैं. बावजूद इसके उन्हें उपाध्यक्ष बनाया गया है.
  • मंजूर अंसारी अल्पसंख्यक मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष हैं. लेकिन उन्हें भी खुश करने के लिए उपाध्यक्ष का पद दे दिया गया.
  • केदार पासवान एससी विभाग के अध्यक्ष हैं, उन्हें भी महासचिव बना दिया गया है.
  • निगम, बोर्ड और आयोग के भी कई अध्यक्ष और सदस्यों को कमेटी में जगह दे दी गयी है.
  • बिट्टु पाठक पालमू जिला के आठ साल तक जिला अध्यक्ष रहे. उनका कार्यकाल काफी अच्छा माना जाता है. उन्हें कमेटी में सचिव का पद दे दिया गया. जबकि उन्हें और कोई महत्वपूर्ण पद दिया जा सकता था.
  • डॉ. परितोष सिंह को कोल्हान में हर कांग्रेसी जानता है. एक बड़ा नाम हैं. जिला परिषद के सदस्य थे. अर्जन मुंडा के भांजे को हराकर यह जिला परिषद सदस्य बने थे. उसे पीसीसी कोऑडीनेटर बनाकर छोड़ दिया गया. वहीं जिनके पास जरा भी जनाधार नहीं है उसे प्रदेश उपाध्यक्ष का पद दे दिया गया है.
  • एससी समुदाय के कई योग्य कार्यकर्ताओं को दरकिनार कर बार-बार सिर्फ भीम कुमार पर पार्टी भरोसा जताती है. इस बार भी भीम कुमार को पार्टी उपाध्यक्ष का पद सौंपा गया है. इससे अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या भीम के अलावा पार्टी के पास कोई दूसरा एससी में विकल्प नहीं है. या फिर दूसरे एससी नेताओं को पार्टी दरकिनार कर रही है.

टिप्पणी

ऐसे और भी कई नाम हैं, जिनके पास पहले से ही काफी जिम्मेदारियां हैं. लेकिन उन्हें भी कमेटी में शामिल किया गया है. कमेटी बनने के बाद से ही कांग्रेस के नेतृत्व पर सवाल खड़े हो रहे हैं. हाल ही में हुए दूसरे राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजे से कांग्रेस को सीख लेनी चाहिए कि कैसे झारखंड में पार्टी अपनी बची हुई सल्तनत को आगे बढ़ाए. यहां यह भी समझना जरूरी है कि पिछले बार के चुनाव से 2024 में पार्टी को कम सीटें आयी थी.

 

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