हजारीबाग के उस गांव की कहानी, जहां कभी नहीं पहुंचे अफसर, वहां की 12 महिलाओं ने ‘सोलर कोल्ड स्टोरेज’ बनाकर लिख दी विकास की नई इबारत

Hazaribagh: कहते हैं कि अगर हौसलों में उड़ान हो, तो रास्ते की रुकावटें भी रास्ता बदल लेती हैं. कुछ ऐसी ही मिसाल...

Hazaribagh: कहते हैं कि अगर हौसलों में उड़ान हो, तो रास्ते की रुकावटें भी रास्ता बदल लेती हैं. कुछ ऐसी ही मिसाल पेश की है कटकमसांडी प्रखंड की डांड पंचायत के अंतर्गत आने वाले एक सुदूरवर्ती और गुमनाम सा गांव ‘गोसी’ की महिलाओं ने. गोसी एक ऐसा गांव है, जिसकी किस्मत में शायद किसी बड़े अधिकारी की गाड़ी का पहिया घूमना भी नहीं लिखा था. टूटी-फूटी और बदहाल सड़कें आज भी चीख-चीखकर इस इलाके की प्रशासनिक उपेक्षा की गवाही देती है. लेकिन, जब व्यवस्था सो गई, तो इस गांव की महिलाएं जाग उठीं. आज गोसी गांव पिछड़ेपन के अंधेरे को चीरकर पूरे जिले के किसानों के लिए आधुनिक खेती और आत्मनिर्भरता का सबसे चमकदार ‘रोल मॉडल’ बन चुका है. यहां की 12 ग्रामीण महिलाओं ने मिलकर एक ऐसा सोलर कोल्ड स्टोरेज खड़ा कर दिया है, जिसकी चर्चा अब हर तरफ है.

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जब मजबूरी बनी मजबूती: ‘परी सखी मंडल’ का उदय

गोसी गांव की इस मूक क्रांति के पीछे है ‘परी सखी मंडल’ की 12 साहसी महिलाएं. समूह की कमान संभाल रहीं अध्यक्ष ममता कुमारी इस सफर की शुरुआत की बड़ी दिलचस्प कहानी बताती हैं. गोसी और आसपास के इलाकों में किसान मेहनत तो खूब करते थे, सब्जियां भी लहलहाती थीं, लेकिन गांव में बिजली की भारी किल्लत और सुदूर इलाका होने के कारण टमाटर, गोभी और हरी मिर्च जैसी फसलें बाजार पहुंचने से पहले ही सड़ने लगती थीं. औने-पौने दाम पर फसल बेचना किसानों की मजबूरी थी. इसी मजबूरी को मजबूती में बदलने के लिए इन महिलाओं ने बीड़ा उठाया. इनके इस जज्बे को पंख दिए वर्ल्ड रिसोर्स इंस्टीट्यूट के सहयोग से लीड्स संस्था ने. इस तरह महिलाओं का यह सपना धरातल पर उतर आया.

6 टन की क्षमता और तकनीक का बेजोड़ हाइब्रिड मॉडल

महिलाओं द्वारा संचालित यह सोलर कोल्ड स्टोरेज पूरी तरह से आधुनिक और पर्यावरण के अनुकूल है. लगभग 6 टन (6000 किलो) की क्षमता वाला यह कोल्ड स्टोरेज पूरी तरह से ‘हाइब्रिड मॉडल’ पर काम करता है. यानी, जब बिजली रहे तो बिजली से, नहीं तो सोलर पैनलों के जरिए सूरज की रोशनी से यह खुद-ब-खुद चार्ज और ठंडा रहता है. इस कोल्ड स्टोरेज की सबसे बड़ी ताकत यह है कि इसमें टमाटर, शिमला मिर्च, गाजर, करेला, बैंगन और परवल जैसी नाजुक सब्जियां भी 15 दिनों तक उतनी ही ताजी और हरी-भरी रहती हैं, जैसी वे खेत से टूटते वक्त थीं. फसल खराब होने का डर अब हमेशा के लिए खत्म हो चुका है.

मात्र ₹1 की ‘जादुई’ लागत और ₹40 हजार की छलांग

इस पूरी कहानी का सबसे खूबसूरत पहलू इसका बिजनेस मॉडल है. कोल्ड स्टोरेज में सब्जियां रखने के लिए किसानों से कोई भारी-भरकम फीस नहीं ली जाती, बल्कि मात्र 1 रुपये प्रति किलो की दर तय की गई है. इस मामूली सी लागत ने किसानों को बाजार का ‘राजा’ बना दिया है. अब किसान अपनी फसल को औने-पौने दाम में बेचने की मजबूरी से आजाद हैं. वे सही समय और बेहतर दाम का इंतजार करते हैं और तब अपनी उपज बाजार में उतारते हैं. नतीजा? आज इस सुदूरवर्ती क्षेत्र के किसान हर महीने 35 से 40 हजार रुपये तक की बंपर कमाई कर रहे हैं.

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पूरा गांव बना आत्मनिर्भर, प्रेरणा की नई मिसाल: आलोक कुमार

यह कोल्ड स्टोरेज सिर्फ एक मशीन नहीं, बल्कि इस इलाके की महिलाओं के सशक्तिकरण का जीता-जागता प्रतीक है. लीड्स संस्था के परियोजना पदाधिकारी आलोक कुमार कहते हैं, “हमारा मकसद सिर्फ एक कोल्ड स्टोरेज बनाना नहीं था, बल्कि महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना और स्थानीय स्तर पर रोजगार पैदा करना था.” आज यह मकसद पूरी तरह कामयाब दिख रहा है. लीड्स कंपनी के सहयोग से इन महिलाओं ने ऊर्जा संरक्षण का जो पाठ पूरे जिले को पढ़ाया है, वह बेजोड़ है. कभी उपेक्षित रहने वाला गोसी गांव आज अपनी तकदीर खुद लिख रहा है और ये 12 महिलाएं पूरे झारखंड के किसानों के लिए प्रेरणा का एक नया अध्याय बन चुकी हैं.

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