Hazaribagh: हजारीबाग समाहरणालय परिसर के कार्यपालिका भवन के पास झाड़ियों और धूल में दबी एक सफेद Hindustan Ambassador अब जंग लगा ढांचा बन चुकी है. टूटी हेडलाइट, मिट्टी से अटी बॉडी और ऊपर लगी धुंधली पड़ चुकी लाल वीआईपी लाइट आज भले ही बेकार दिखाई देती हो, लेकिन कभी यही गाड़ी जिले की प्रशासनिक ताकत और रुतबे का प्रतीक मानी जाती थी. एक दौर था जब इस एम्बेसडर की आवाज सुनते ही सरकारी दफ्तरों में हलचल बढ़ जाती थी. फाइलें संभाली जाती थीं और कर्मचारी सतर्क हो जाते थे.

लाल बत्ती सिर्फ उपकरण नहीं, रुतबे की पहचान थी
ऊपर लगी लाल बत्ती उस समय प्रशासनिक शक्ति का प्रतीक मानी जाती थी. जिले के डीसी और बड़े अधिकारी इसी शान से शहर का दौरा करते थे. सड़कें खाली कराई जाती थीं, चौक-चौराहों पर पुलिस तैनात रहती थी और लोगों की नजरें गाड़ी के शीशों पर टिक जाती थीं. लेकिन अब उसी गाड़ी के बोनट पर पत्ते सड़ रहे हैं. टायर मिट्टी में धंस चुके हैं और बॉडी पर काई जम गई है. कभी रौब का प्रतीक रही लाल बत्ती अब धूल में अपनी पहचान तलाशती नजर आती है.
सत्ता और समय की कहानी कहती एम्बेसडर
एक समय भारत में एम्बेसडर कार सिर्फ वाहन नहीं, बल्कि स्टेटस सिंबल मानी जाती थी. नेताओं, अफसरों और सरकारी तंत्र की यह पहली पसंद थी. मजबूत बॉडी, विशाल सीटें और राजसी अंदाज इसकी खास पहचान हुआ करती थी. हजारीबाग जैसे जिलों में डीसी की एम्बेसडर पूरे प्रशासनिक तंत्र की पहचान मानी जाती थी. समय के साथ नई एसयूवी गाड़ियां आईं, लाल बत्ती संस्कृति खत्म हुई और सरकारी शानो-शौकत के पुराने प्रतीक इतिहास बनते चले गए.
‘वक्त सबसे बड़ा शासक’ का संदेश देती तस्वीर
समाहरणालय परिसर में खड़ी यह खामोश एम्बेसडर सिर्फ एक पुरानी गाड़ी नहीं, बल्कि समय की सबसे बड़ी सच्चाई भी बयां करती है. आज जो सत्ता, पद और प्रतिष्ठा के शिखर पर है, वक्त के साथ उसकी चमक भी फीकी पड़ सकती है.
यह दृश्य मानो हर गुजरने वाले से यही कहता है कि अधिकार, वैभव और पहचान स्थायी नहीं होते. समय गुजरने के साथ सबसे चमकदार पहचान भी धूल में मिल जाती है. इसलिए इंसान को अपने पद से ज्यादा अपने व्यवहार और विनम्रता पर गर्व करना चाहिए.
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