10 जून से झारखंड में सैंड लॉकडाउन: मांग और आपूर्ति का खौफनाक गणित, 60 फीसदी का ‘ब्लैक होल, हो जाएगी 4 लाख मजदूरों की रोजी-रोटी पर आफत

Ranchi: आज से ठीक 18 दिन बाद, आगामी 10 जून से राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) के सख्त निर्देश पर सूबे की नदियों...

Ranchi: आज से ठीक 18 दिन बाद, आगामी 10 जून से राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) के सख्त निर्देश पर सूबे की नदियों से बालू के उठाव पर 15 अक्टूबर तक के लिए पूर्ण प्रतिबंध लग जाएगा. मानसून दस्तक देने को है, लेकिन झारखंड में बालू की किल्लत को लेकर मचे हाहाकार को दूर करने की फाइलें सरकारी दफ्तरों की अलमारियों में रेंग रही हैं. झारखंड राज्य खनिज विकास निगम (जेएसएमडीसी) से बालू घाटों का नियंत्रण छीनकर जिला उपायुक्तों (डीसी) को सौंपने का सरकार का ‘ मास्टरस्ट्रोक धीमा पड़ गया है. खान निदेशालय के कड़े निर्देश के बावजूद धरातल पर सन्नाटा पसरा है, जिसका सीधा नतीजा यह है कि आने वाले दिनों में झारखंड में एक-एक पक्के मकान और सरकारी योजनाओं की नींव बालू की बूंद-बूंद के लिए तरसने वाली है. झारखंड में कुल 444 बालू घाट चिह्नित हैं, इसमें 298 घाटों की ही नीलामी प्रक्रिया पूरी की जा सकी है, जबकि 146 घाटों पर प्रशासनिक पेंच आज भी जस का तस फंसा हुआ है.

यह भी पढ़ें: डीजीपी तदाशा मिश्रा का लातेहार दौरा: सुरक्षा व्यवस्था को लेकर DIG और एसपी के साथ की समीक्षा बैठक

13 भाग्यशाली ठेकेदारों को ही उपायुक्त कार्यालयों से हरी झंडी

नीलामी में सफल रहे ठेकेदारों में से महज 35 ही इन कठिन वैधानिक कांटों को पार कर सके. त्रासदी देखिए कि इन 35 सफल ठेकेदारों में से भी केवल 13 भाग्यशाली ठेकेदारों को ही उपायुक्त कार्यालयों से हरी झंडी (एकरारनामा) मिल पाई है. नियम बिल्कुल स्पष्ट है. बिना एग्रीमेंट के नदियों में पोकलेन या कुदाल नहीं चल सकती, यानी, 444 घाटों वाले राज्य में मानसून से ठीक पहले सिर्फ 13 घाट ही वैध रूप से बालू देने की स्थिति में हैं. बाकी के घाट या तो फाइलों में दफन हैं या पर्यावरण मंजूरी (ईसी) के अभाव में एक छटांक बालू देने में भी असमर्थ हैं.

मांग और आपूर्ति का खौफनाक गणित: 60 फीसदी का ‘ब्लैक होल’

झारखंड के निर्माण क्षेत्र में बालू की मांग और आपूर्ति के बीच का गणित बेहद डरावना और हैरान करने वाला है. राज्य को अपने बुनियादी ढांचे को चालू रखने के लिए रोजाना करीब 1.5 लाख से लेकर 2 लाख घन फीट (सीएफटी) बालू की सख्त जरूरत होती है. जनवरी से जून तक चलने वाले पीक सीजन में यह मांग अपने चरम पर होती है. इस भारी-भरकम मांग के मुकाबले वर्तमान में वैध सप्लाई में 60 फीसदी का भारी अंतर (शॉर्टेज) आ चुका है. इस साठ फीसदी के ‘ब्लैक होल’ ने झारखंड सरकार की महत्वकांक्षी फ्लैगशिप योजनाओं (जैसे अबुआ आवास, पीएम आवास, पुल-पुलिया और सड़कें) की रीढ़ तोड़ दी है. इससे आम जनता की जेब तो कट ही रही है, सरकारी खजाने को भी अरबों की चपत लग रही है, और बालू के अवैध वर्चस्व के कारण राज्य की कानून व्यवस्था दांव पर लग गई है.

रोजगार का महासंकट: चूल्हा बुझने की कगार पर

10 जून के बाद राज्य में रोजगार का एक अभूतपूर्व महासंकट खड़ा होने जा रहा है, जिसकी मार दो स्तरों पर पड़ेगी. राज्य के विभिन्न बालू घाटों पर सीधे तौर पर काम करने वाले लगभग 50,000 से 70,000 मजदूरों का रोजगार 10 जून की सुबह होते ही पूरी तरह खत्म हो जाएगा. नदियों पर सन्नाटा पसरते ही इनके घरों के चूल्हे बुझने की कगार पर आ जाएंगे. बालू थमेगी तो निर्माण कार्य थमेगा. इसके कारण कंस्ट्रक्शन सेक्टर से जुड़े 3 से 4 लाख लोग सीधे प्रभावित होंगे. इनमें राजमिस्त्री, दिहाड़ी हेल्पर, ट्रक-हाइवा के मालिक और उनके ड्राइवर शामिल हैं.

यह भी पढ़ें: हजारीबाग में अवैध आरा मशीन पर वन विभाग का बड़ा एक्शन, मशीन सेट और 25 पीस चिरान पटरा जब्त, लकड़ी माफियाओं में हड़कंप

उपायुक्तों की चौखट पर एग्रीमेंट की फाइलें

22 बालू घाटों के एग्रीमेंट की फाइलें पिछले एक सप्ताह से संबंधित जिलों के उपायुक्तों (डीसी) के टेबल पर धूल फांक रही हैं. यदि इन फाइलों पर समय रहते दस्तखत हो जाते, तो मानसून से पहले कुछ राहत मिल सकती थी. दुमका में पांच, खूंटी में तीन, रामगढ़ में तीन घाटों की फाइल डीसी के स्तर पर लंबित हैं. वहीं रांची में तीन, हजारीबाग में दो, गोड्डा में दो, लातेहार में दो, जामताड़ा में एक और पूर्वी सिंहभूम में एक घाट की फाइल पेंडिंग है.

सम्बंधित ख़बरें

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *