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‘महापुरुषों की जीवनी से सीखें कि वे कैसे महापुरुष बने’: हजारीबाग में रामाश्रम सत्संग मथुरा का तीन दिवसीय आध्यात्मिक महासंगम, आचार्य ओम भैया ने समझाया गुरु-शिष्य परंपरा का असली मर्म

Hazaribagh: रामाश्रम सत्संग मथुरा, उपकेंद्र हजारीबाग के तत्वावधान में आयोजित तीन दिवसीय भव्य आंतरिक सत्संग समारोह के तृतीय सत्र में श्रद्धालुओं को...

Hazaribagh: रामाश्रम सत्संग मथुरा, उपकेंद्र हजारीबाग के तत्वावधान में आयोजित तीन दिवसीय भव्य आंतरिक सत्संग समारोह के तृतीय सत्र में श्रद्धालुओं को भक्ति और ज्ञान की रसधार में गोते लगाने का अनूठा अवसर मिला. समारोह को मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित करते हुए प्रख्यात आध्यात्मिक गुरु आचार्य ओम भैया ने गुरु-शिष्य परंपरा के सनातन महत्व पर बेहद गहराई से प्रकाश डाला. उन्होंने जनसमुदाय को प्रेरित करते हुए कहा कि हमें महापुरुषों की जीवनी का केवल अध्ययन नहीं करना चाहिए, बल्कि उनके जीवन संघर्षों और आदर्शों से यह सच्ची सीख लेनी चाहिए कि वे किन महान गुणों और साधना के बल पर महापुरुष बने. आचार्य ने कहा कि गुरु महाराज की महिमा अनादि, अनंत और पूरी तरह अपरंपार है, क्योंकि गुरु केवल किताबी ज्ञान देने वाले शिक्षक नहीं होते, बल्कि वे आत्मा को परमात्मा से मिलाने वाले और जीवन को सही दिशा प्रदान करने वाले सच्चे मार्गदर्शक होते हैं.

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साधना, श्रद्धा और पूर्ण आत्मसमर्पण से ही संभव है गुरु कृपा की प्राप्ति

पंडाल में मौजूद हजारों मंत्रमुग्ध श्रद्धालुओं को अपने दिव्य आशीर्वचन देते हुए आचार्य ओम भैया ने एक बेहद गूढ़ आध्यात्मिक रहस्य को साझा किया. उन्होंने दो टूक शब्दों में समझाया कि “गुरु में होना और गुरु का होना, ये दोनों बिल्कुल अलग-अलग बातें हैं.” उन्होंने इसकी व्याख्या करते हुए कहा कि गुरु में होना साधना, श्रद्धा और अटूट समर्पण का प्रारंभिक चरण है, जहां साधक गुरु की शरण में कदम रखता है. इसके विपरीत, गुरु का होना पूर्ण आत्मसमर्पण, अटूट विश्वास और आचरण की परिपक्वता का सर्वोच्च प्रतीक है, जहां शिष्य का अपना कोई अस्तित्व नहीं बचता. उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि जब कोई साधक अपने भीतर के अहंकार, स्वार्थ, ईर्ष्या और संकीर्णताओं का पूरी तरह त्याग कर देता है और गुरु के बताए वचनों व मार्ग पर चलने लगता है, तभी वह गुरु कृपा का वास्तविक अधिकारी बनता है और उसका जीवन धन्य हो जाता है.

बाहरी सुख-सुविधाओं की अंधी दौड़ को छोड़ आत्मचिंतन की ओर बढ़ने का आह्वान

वर्तमान आधुनिक जीवनशैली और समाज की विसंगतियों पर चिंता व्यक्त करते हुए आचार्य ओम भैया ने कहा कि आज का मनुष्य बाहरी दुनिया की सुख-सुविधाओं और भौतिक साधनों की अंधी खोज में लगातार भटक रहा है और मानसिक अशांति का शिकार हो रहा है. उन्होंने आगाह किया कि संसार की कोई भी भौतिक वस्तु मनुष्य को स्थाई सुख नहीं दे सकती, क्योंकि वास्तविक शांति, असीम संतोष और आनंद केवल आत्मचिंतन, नियमित सत्संग और सद्गुरु के पावन सान्निध्य में ही प्राप्त किया जा सकता है. उन्होंने हजारीबाग और आसपास से आए तमाम श्रद्धालुओं से पुरजोर आह्वान किया कि वे नियमित सत्संग, निस्वार्थ सेवा और दैनिक साधना को अपने जीवन का अभिन्न अंग बनाएं. गौरतलब है कि इस भव्य सत्संग समारोह के अंतर्गत भजन, भावपूर्ण प्रवचन एवं ध्यान का सामूहिक कार्यक्रम कुल पांच अलग-अलग सत्रों में सुनियोजित तरीके से आयोजित किया गया है.

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भजन, कीर्तन और आध्यात्मिक चर्चाओं से गूंजा माहौल, सद्भाव फैलाने का संकल्प

इस त्रिविध धार्मिक महासंगम के दौरान सुबह से लेकर शाम तक आयोजित हुए मधुर भजनों, ज्ञानवर्धक प्रवचनों एवं उच्च स्तरीय आध्यात्मिक चर्चाओं के माध्यम से उपस्थित श्रद्धालुओं ने अभूतपूर्व आध्यात्मिक लाभ प्राप्त किया. पूरा परिसर गुरु महाराज के जयकारों और भक्तिमय भजनों से गुंजायमान रहा. इस पावन अवसर पर हजारीबाग जिले के कोने-कोने से बड़ी संख्या में महिला एवं पुरुष श्रद्धालुओं ने उपस्थित होकर गुरु महाराज के चित्र पर पुष्प अर्पित कर अपनी गहरी श्रद्धा व्यक्त की. सत्संग के समापन पर सभी भक्तों ने सामूहिक रूप से समाज में आपसी प्रेम, भाईचारा, सांप्रदायिक सद्भाव और उच्च आध्यात्मिक व नैतिक मूल्यों के प्रसार करने का अटूट संकल्प लिया, जिससे पूरे क्षेत्र का माहौल पूरी तरह भक्तिमय और सकारात्मक ऊर्जा से सराबोर नजर आया.

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