Hazaribagh: एक समय था जब हजारीबाग का राजकीय संस्कृत उच्च विद्यालय संस्कृत शिक्षा का प्रमुख केंद्र माना जाता था. यहां दूर-दराज़ के विद्यार्थी संस्कृत व्याकरण, साहित्य और शास्त्रों की पढ़ाई के लिए पहुंचते थे. विद्यालय परिसर विद्यार्थियों की गतिविधियों और शैक्षणिक माहौल से गुलजार रहता था. लेकिन समय के साथ हालात ऐसे बदले कि आज जिले का यह एकमात्र संस्कृत उच्च विद्यालय लगभग निष्प्राण अवस्था में पहुंच गया है.

गौरवशाली इतिहास अब यादों तक सीमित
वर्ष 1954 में स्थापित इस विद्यालय ने दशकों तक संस्कृत शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. विद्यालय में प्राचार्य सहित नौ शिक्षकों, एक लिपिक और एक आदेशपाल के पद स्वीकृत थे. यहां नियमित रूप से संस्कृत बोर्ड की परीक्षाएं आयोजित होती थीं और बड़ी संख्या में छात्र अध्ययन करते थे.
पूर्व प्रभारी प्राचार्य डॉ. प्रमोद कुमार के अनुसार, एक दौर ऐसा भी था जब यहां विद्यार्थियों की संख्या जिले के कई प्रतिष्ठित विद्यालयों के बराबर या उससे अधिक हुआ करती थी. संस्कृत विषय में रुचि रखने वाले छात्रों के लिए यह संस्थान पहली पसंद माना जाता था.
नियुक्तियां रुकीं, खत्म होती गई शैक्षणिक गतिविधियां
विद्यालय की स्थिति बिगड़ने का सिलसिला 1990 के दशक के बाद शुरू हुआ. वर्ष 1994 में हुई शिक्षकों की नियुक्ति के बाद यहां किसी नए शिक्षक की बहाली नहीं की गई. समय के साथ शिक्षक सेवानिवृत्त होते गए और रिक्त पदों को भरने की दिशा में कोई ठोस पहल नहीं हुई.
वर्ष 2011 में तत्कालीन प्रभारी प्राचार्य डॉ. प्रमोद कुमार के सेवानिवृत्त होने तथा अन्य शिक्षकों के पदोन्नत होकर स्थानांतरित होने के बाद विद्यालय पूरी तरह शिक्षकविहीन हो गया. इसके बाद यहां शैक्षणिक गतिविधियां लगभग ठप पड़ गईं.
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अब न शिक्षक हैं, न छात्र
वर्तमान में विद्यालय की स्थिति बेहद चिंताजनक है. यहां केवल एक आदेशपाल और प्रतिनियुक्ति पर कार्यरत एक लिपिक ही मौजूद हैं. न तो कोई नियमित शिक्षक है और न ही प्राचार्य. विद्यार्थियों के अभाव में कक्षाएं भी संचालित नहीं हो रही हैं. स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि वर्ष 2024 के बाद से मध्यमा परीक्षा के लिए आवेदन प्रक्रिया भी बंद हो गई है, क्योंकि विद्यालय में नामांकन ही नहीं हो रहा है.
अधूरी इमारत और जर्जर होता ढांचा
विद्यालय का भौतिक ढांचा भी उपेक्षा की कहानी बयां करता है. शुरुआती वर्षों में यह संस्थान जिला स्कूल के छात्रावास परिसर से संचालित होता था. बाद में इसे पीडब्ल्यूडी द्वारा निर्मित भवन में स्थानांतरित किया गया, जहां केवल तीन कमरे उपलब्ध कराए गए थे. वर्ष 2008 में तत्कालीन विधायक सौरभ नारायण सिंह की पहल पर विधायक मद से दो अतिरिक्त कमरों का निर्माण शुरू हुआ. इसके बाद सरकारी योजना के तहत चार और कमरे बनाए गए, लेकिन भवन का ऊपरी हिस्सा आज भी अधूरा पड़ा हुआ है.
संस्कृत शिक्षा के संरक्षण पर उठ रहे सवाल
संस्कृत को भारतीय ज्ञान परंपरा की आधारभूत भाषा माना जाता है, लेकिन बदलते समय में इसकी ओर युवाओं का रुझान लगातार घटता दिखाई दे रहा है. ऐसे में जिले के एकमात्र संस्कृत उच्च विद्यालय का इस स्थिति में पहुंच जाना शिक्षा जगत और संस्कृति प्रेमियों के लिए चिंता का विषय बन गया है. शिक्षाविदों और पूर्व विद्यार्थियों का मानना है कि यदि सरकार और शिक्षा विभाग गंभीर पहल करें तो इस संस्थान को फिर से सक्रिय बनाया जा सकता है. उनका कहना है कि यह केवल एक विद्यालय को बचाने का मामला नहीं है, बल्कि जिले की सांस्कृतिक और शैक्षणिक विरासत को संरक्षित रखने का प्रश्न भी है.
बड़ा सवाल
कभी संस्कृत शिक्षा का प्रमुख केंद्र रहा यह विद्यालय आज अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा है. ऐसे में सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या प्रशासन और शिक्षा विभाग समय रहते इस धरोहर को पुनर्जीवित करने के लिए कदम उठाएंगे, या फिर यह संस्थान इतिहास के पन्नों में दर्ज एक और भूली-बिसरी विरासत बनकर रह जाएगा.
