लोक आस्था का केंद्र बना टिको शिव मंदिर, भोलेनाथ के दरबार में पूरी होती है श्रद्धालुओं की हर मुराद

Lohardaga: कुड़ू प्रखंड की जीमा और टाटी पंचायत की सीमा पर ऐतिहासिक टिको नदी के तट पर स्थित टिको शिव मंदिर आज...

टिको शिव मंदिर
Tiko Shiva Temple emerges as a center of public faith

Lohardaga: कुड़ू प्रखंड की जीमा और टाटी पंचायत की सीमा पर ऐतिहासिक टिको नदी के तट पर स्थित टिको शिव मंदिर आज लोक आस्था का प्रमुख केंद्र बन चुका है. श्रद्धालुओं का विश्वास है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई हर मन्नत भगवान भोलेनाथ पूरी करते हैं. यही वजह है कि झारखंड के अलावा उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, ओडिशा, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, दिल्ली और मुंबई सहित देश के कई हिस्सों से लोग यहां रुद्राभिषेक, शिव पुराण पाठ और विशेष पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं. इन दिनों टिको शिव मंदिर विवाह समारोहों के लिए भी खास पहचान बना चुका है. मंदिर परिसर में पूरे वर्ष विवाह आयोजित होते हैं और हर साल करीब 120 से अधिक जोड़े यहां वैवाहिक बंधन में बंधते हैं. धार्मिक वातावरण में संपन्न होने वाले ये विवाह श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं.

लगभग 100 वर्ष पुराना है शिव मंदिर

स्थानीय लोगों के अनुसार, टिको शिव मंदिर का इतिहास लगभग 100 वर्ष पुराना है. बताया जाता है कि वर्ष 1920 के आसपास पुरोहित गंगाधर पाठक को स्वप्न में भगवान शिव ने दर्शन देकर टिको नदी किनारे प्रकट हुए शिवलिंग की पूजा करने का संकेत दिया था. अगले दिन नदी तट पर उन्हें शिवलिंग मिला, जिसके बाद उन्होंने विधिवत पूजा-अर्चना शुरू की. धीरे-धीरे इस चमत्कारी शिवलिंग की ख्याति दूर-दूर तक फैल गई और श्रद्धालुओं का यहां आना शुरू हो गया. अंग्रेजी शासन के दौरान लोग भय के कारण चोरी-छिपे यहां पूजा करने आते थे. बाद में श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ने पर पहले खपरैल का मंदिर बनाया गया और फिर ग्रामीणों के सहयोग से वर्तमान भव्य मंदिर का निर्माण हुआ.

श्मशान घाट के पास स्थापित है टिको शिव मंदिर 

टिको शिव मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह श्मशान घाट के समीप स्थित है. स्थानीय मान्यता के अनुसार देश में ऐसे बहुत कम शिवधाम हैं, जहां शिव मंदिर श्मशान घाट के पास स्थापित है. इसी कारण इसे अत्यंत सिद्ध और जागृत शिवधाम माना जाता है. श्रद्धालुओं का विश्वास है कि यहां भगवान शिव से की गई प्रार्थना कभी व्यर्थ नहीं जाती. मंदिर के पुरोहित लवकेश पाठक बताते हैं कि वाराणसी, विंध्याचल, कांचीपुरम और पश्चिम बंगाल के तारापीठ की तरह टिको शिव मंदिर भी श्मशान घाट के समीप स्थित है. उनका कहना है कि ऐसे स्थानों पर भगवान शिव की विशेष कृपा रहती है और श्रद्धा से की गई आराधना से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं.

धार्मिक आयोजनों की दृष्टि से भी टिको शिव मंदिर पूरे क्षेत्र का प्रमुख केंद्र है. महाशिवरात्रि पर यहां हजारों श्रद्धालु जलाभिषेक के लिए पहुंचते हैं. सावन माह में प्रतिदिन कांवरियों और शिवभक्तों की लंबी कतारें लगती हैं. इसके अलावा मंदिर परिसर में छठ पूजा, शिव पुराण कथा, रुद्राभिषेक, भंडारा और अन्य धार्मिक कार्यक्रम पूरे वर्ष आयोजित किए जाते हैं. मंदिर के समीप बहने वाली ऐतिहासिक टिको नदी भी इस स्थल की विशेष पहचान है. स्थानीय मान्यता के अनुसार वर्ष 1851-52 में अंग्रेजी सेना और आंदोलनकारियों के बीच हुए संघर्ष के दौरान इस नदी में रक्त की धारा बही थी. ग्रामीणों का विश्वास है कि इसी कारण यह नदी कभी पूरी तरह नहीं सूखती और आज भी इसका धार्मिक महत्व बना हुआ है.

कैसे पहुंचे टिको शिव मंदिर

टिको शिव मंदिर रांची से लगभग 62 किलोमीटर, लोहरदगा से 23 किलोमीटर और चंदवा से 22 किलोमीटर की दूरी पर, कुड़ू-चंदवा मुख्य मार्ग पर टिको आईटीआई कॉलेज के समीप स्थित है. यहां सड़क मार्ग से रांची, लोहरदगा और चंदवा से बस और टेम्पो की सुविधा उपलब्ध है. रेलमार्ग से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए लोहरदगा रेलवे स्टेशन (23 किमी), टोरी रेलवे स्टेशन (22 किमी) और बड़की चांपी रेलवे स्टेशन (12 किमी) सबसे नजदीक हैं. इन स्टेशनों से सड़क मार्ग के जरिए आसानी से मंदिर पहुंचा जा सकता है.

टिको शिव मंदिर अपनी ऐतिहासिक विरासत, धार्मिक मान्यताओं और अटूट आस्था के कारण आज न केवल लोहरदगा, बल्कि पूरे झारखंड का प्रमुख शिवधाम बन चुका है. यहां हर दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु भगवान भोलेनाथ के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं.

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