Ranchi: झारखंड में सुरक्षित मातृत्व को लेकर कई योजनाएं चलाए जाने के बावजूद मातृ मृत्यु दर में हुई बढ़ोतरी ने स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है. सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम की रिपोर्ट के अनुसार राज्य में मातृ मृत्यु दर बढ़कर 82 प्रति एक लाख जीवित प्रसव हो गई है. इससे पहले जारी रिपोर्ट में यह आंकड़ा 54 था. यानी हर एक लाख प्रसव पर अब 28 अधिक महिलाओं की मौत दर्ज की जा रही है. राज्य में हर साल करीब 10 लाख प्रसव होते हैं. इनमें बड़ी संख्या में प्रसव सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में कराए जा रहे हैं. मौजूदा मातृ मृत्यु दर के आधार पर अनुमान लगाया जाए तो राज्य में हर वर्ष प्रसव और उससे जुड़ी जटिलताओं के कारण सैकड़ों महिलाओं की जान जा रही है. यह स्थिति तब है जब संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देने, गर्भवती महिलाओं की नियमित जांच, एम्बुलेंस सुविधा और अन्य स्वास्थ्य सेवाओं पर लगातार जोर दिया जा रहा है.

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स्वास्थ्य विभाग ने कहा- एक बड़ा कारण मौतों की बेहतर रिपोर्टिंग
स्वास्थ्य विभाग का मानना है कि मातृ मृत्यु दर में बढ़ोतरी का एक बड़ा कारण मौतों की बेहतर रिपोर्टिंग भी है. पहले कई जिलों से मातृत्व मृत्यु के मामले दर्ज ही नहीं हो पाते थे, जबकि अब निगरानी और रिपोर्टिंग व्यवस्था मजबूत हुई है. कुछ जिलों में अब भी मातृत्व मृत्यु के मामले शून्य दर्ज होना विशेषज्ञों के अनुसार बेहतर स्थिति से अधिक रिपोर्टिंग की कमजोरी की ओर संकेत करता है. दूसरी ओर, बड़े अस्पतालों और मेडिकल संस्थानों वाले जिलों में मातृत्व मृत्यु के अधिक मामले सामने आ रहे हैं. इसकी वजह यह है कि गंभीर और जटिल गर्भावस्था वाले मरीजों को दूर-दराज के क्षेत्रों से रेफर कर इन्हीं केंद्रों पर भेजा जाता है. कई बार मरीजों के अस्पताल पहुंचने में देरी हो जाती है, जिससे जोखिम बढ़ जाता है.
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ग्रामीण इलाकों में गर्भवती महिलाओं को समय पर नहीं मिल पाती मेडिकल सुविधा
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि राज्य में संस्थागत प्रसव का प्रतिशत लगातार बढ़ा है और अब अधिकांश महिलाएं अस्पतालों में ही प्रसव करा रही हैं. हालांकि, ग्रामीण इलाकों से आने वाली कई गर्भवती महिलाओं को समय पर चिकित्सा सुविधा नहीं मिल पाती. अस्पताल पहुंचने में देरी, गंभीर स्वास्थ्य स्थिति और विशेषज्ञ सेवाओं की कमी कई मामलों में मातृ मृत्यु का कारण बनती है.
