Hazaribagh : पुराना धरना स्थल के निकट खतियानी परिवार की साप्ताहिक बैठक अध्यक्ष अशोक राम की अध्यक्षता में संपन्न हुई. बैठक में झारखंड की स्थानीय और जन भाषाओं को लेकर एक स्पष्ट संदेश देते हुए संगठन ने बाहरी भाषाओं को प्रदेश में थोपे जाने का कड़ा विरोध किया है.

‘जन भाषाओं की अपनी गरिमा और पहचान है’
खतियानी परिवार के केंद्रीय महासचिव मोहम्मद हकीम ने बैठक को संबोधित करते हुए कहा कि झारखंड प्रदेश में आदिवासियों और सदानों द्वारा बोली जाने वाली भाषाएं जैसे नागपुरी, पंचपरगनिया, मुंडारी, हो और खोरठा आदि की अपनी समृद्ध परंपरा है. उन्होंने कहा कि झारखंड में ‘चार कोस पर पानी और आठ कोस पर बोली’ बदलने वाली संस्कृति है, जो हमारी भाषाई विविधता का प्रमाण है.
डॉ. बीपी केसरी के योगदान को किया याद
मोहम्मद हकीम ने कहा कि झारखंड आंदोलन के महानायक डॉ. बीपी केसरी ने विश्वविद्यालय स्तर पर यहां की जन भाषाओं का अध्ययन और पठन-पाठन सुनिश्चित कराया था. खोरठा भाषा के क्षेत्रीय स्वरूपों का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि हजारीबाग, चतरा और कोडरमा की खोरठा का रूप अलग है, जबकि रामगढ़, बोकारो, गिरिडीह और धनबाद में इसका दूसरा रूप प्रचलित है. उन्होंने स्पष्ट किया कि झारखंड की इन जन भाषाओं को संवैधानिक मान्यता पहले ही मिल चुकी है.
बाहरी भाषाओं के दखल का विरोध
संगठन ने साफ तौर पर कहा कि प्रदेश में बाहर से आकर बसने वाले लोगों द्वारा अपनी भाषाओं को झारखंडी जन भाषाओं के साथ मान्यता दिलाने की मांग गलत है. उन्होंने कहा कि झारखंडी बोलियों के स्थान पर अन्य प्रदेशों की बोलियों को बढ़ावा देना झारखंडी अस्मिता के साथ खिलवाड़ है. खतियानी परिवार ने हेमंत सोरेन सरकार से मांग की कि नियुक्तियों में केवल झारखंडी जन भाषाओं को ही आधार बनाया जाए. उन्होंने चेतावनी दी कि भाषा के आधार पर किसी भी प्रकार का ‘हेट-फेट’ या बाहरी हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.
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