Hazaribagh : भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक तकनीक के समन्वय को भविष्य की आवश्यकता बताते हुए विश्वविद्यालय के पूर्व प्रतिकुलपति प्रो. अंजनी कुमार श्रीवास्तव ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता को भारतीय ज्ञान परंपरा के साथ जोड़कर आगे बढ़ाया जाए तो भारत विश्व पटल पर नई पहचान स्थापित कर सकता है. इससे देश एक बार फिर वैश्विक नेतृत्व की भूमिका निभाने में सक्षम होगा. वह शनिवार को स्वामी विवेकानंद सभागार में आयोजित छह दिवसीय संकाय विकास कार्यक्रम के समापन सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित कर रहे थे. उन्होंने कहा कि शिक्षा में उत्कृष्टता, समान भागीदारी और विस्तार तीनों आवश्यक हैं, लेकिन इनमें सबसे महत्वपूर्ण समान भागीदारी है. भगवान बिरसा मुंडा के नारे “अबुआ दिसुम, अबुआ राज” का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा हमारी सांस्कृतिक पहचान का मूल आधार है और इसके बिना हमारी विशिष्टता अधूरी है.

भारतीय ज्ञान परंपरा में गांधी और अंबेडकर भी शामिल
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विनोबा भावे विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. चंद्र भूषण शर्मा ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा केवल वेद, पुराण और उपनिषद जैसे प्राचीन ग्रंथों तक सीमित नहीं है. इसमें महात्मा गांधी और बाबा साहेब अंबेडकर जैसे आधुनिक विचारकों के चिंतन भी समान रूप से समाहित हैं. उन्होंने कहा कि किसी भी आयोजन या नीति की सफलता का वास्तविक पैमाना यह है कि उसका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे. इसी दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए शिक्षा और पाठ्यक्रम निर्माण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाना चाहिए.
विद्यार्थियों की जरूरतों के अनुरूप हो पाठ्यक्रम
कुलपति ने कहा कि सभी विद्यार्थियों के लिए एक जैसा पाठ्यक्रम आवश्यक नहीं है. पाठ्यक्रम निर्धारण के दौरान अंतिम पंक्ति में खड़े विद्यार्थी की आवश्यकताओं और उसकी परिस्थितियों को ध्यान में रखा जाना चाहिए. जिस प्रकार का भारतीय ज्ञान किसी विद्यार्थी के लिए उपयोगी और प्रासंगिक हो, उसे उसी रूप में उपलब्ध कराया जाना चाहिए. उन्होंने शिक्षकों से भारतीय और पाश्चात्य दोनों ज्ञान प्रणालियों का गहन अध्ययन करने का आह्वान किया, ताकि वे अपनी स्वतंत्र और संतुलित समझ विकसित कर सकें.
शोध आधारित कार्यक्रमों की होगी अगली श्रृंखला
प्रो. शर्मा ने कार्यक्रम को सफलतापूर्वक पूरा करने वाले सभी प्रतिभागियों को बधाई देते हुए कहा कि अगले चरण में काशी हिंदू विश्वविद्यालय के सहयोग से शोध आधारित कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा. उन्होंने यह भी संकेत दिया कि भविष्य में विश्वविद्यालय के शोधार्थियों को भी ऐसे आयोजनों में शामिल करने का प्रयास किया जाएगा.
समापन नहीं, नई शुरुआत है यह आयोजन
विशिष्ट अतिथि प्रो. आशीष श्रीवास्तव ने कहा कि इस समापन सत्र को अंत नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत के रूप में देखा जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि इस बार काशी हिंदू विश्वविद्यालय के प्रतिनिधि विभावि आए हैं, भविष्य में विनोबा भावे विश्वविद्यालय के शिक्षक और शोधार्थी भी वहां जाकर शैक्षणिक संवाद को आगे बढ़ाएंगे. उन्होंने प्रतिभागियों की सराहना करते हुए कहा कि सभी प्रतिभागियों में सीखने की उत्सुकता, सकारात्मक दृष्टिकोण और विनम्रता स्पष्ट रूप से दिखाई दी.
भारतीय ज्ञान परंपरा दिशा देगी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता क्षमता बढ़ाएगी
कार्यक्रम के सार को प्रस्तुत करते हुए प्रो. आशीष श्रीवास्तव ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा हमें दिशा देती है, कृत्रिम बुद्धिमत्ता क्षमता प्रदान करती है, समान भागीदारी उद्देश्य स्पष्ट करती है, शोध समस्याओं के समाधान का मार्ग दिखाता है, सरकार शक्ति प्रदान करती है और शिक्षण इन सभी प्रयासों को सार्थकता देता है.
प्रतिभागियों ने साझा किए अनुभव
इससे पूर्व कार्यक्रम निदेशक एवं सीसीडीसी प्रो. मिथिलेश कुमार सिंह ने छह दिवसीय कार्यक्रम का प्रतिवेदन प्रस्तुत किया. प्रतिभागियों की ओर से डॉ. मनीष कुमार झा तथा डॉ. कुमारी भारती सिंह ने अपने अनुभव साझा किए. कार्यक्रम में कुलसचिव प्रो. सुरेंद्र कुमार कुशवाहा ने स्वागत भाषण दिया, जबकि संयोजक एवं पीएम उषा के निदेशक डॉ. अरुण कुमार मिश्रा ने संचालन के साथ धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया.
Also Read : सीएम हेमंत की चुनावी बिसात: दो सेटों में दाखिल होगा नामांकन
