Ravi Bharti

Ranchi : झारखंड की सियासत में इन दिनों हवाओं का रुख बदला-बदला है. मौसम वैज्ञानिकों को भले ही मानसून का इंतजार हो, लेकिन राज्य के सियासी गलियारों में हॉर्स ट्रेडिंग (विधायकों की खरीद-फरोख्त) के बादलों ने अभी से डेरा डाल दिया है. मौका है राज्यसभा चुनाव का, और बिसात ऐसी बिछी है कि बड़े-बड़े दिग्गजों के पसीने छूट रहे हैं. इस बार का दंगल आम नहीं है. चुनावी अखाड़े में दो ऐसे हैवीवेट निर्दलीयों की एंट्री हुई है, जिनके नाम ही सियासी दलों के समीकरण बिगाड़ने के लिए काफी हैं. परिमल नाथवानी और विजय साईं रेड्डी. इन दो नामों ने झारखंड के राजनीतिक पंडितों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या राज्य की विधानसभा अब केवल वोट देने की जगह नहीं, बल्कि डील पक्की करने का एक आलीशान बाजार बन चुकी है.
नियम 10 का खेल भीतरघात का
नियम कहता है कि राज्यसभा उम्मीदवार के नामांकन के लिए कम से कम 10 विधायकों का प्रस्तावक के रूप में हस्ताक्षर करना अनिवार्य है. अब गणित की थोड़ी सी भी समझ रखने वाला व्यक्ति बता सकता है कि झारखंड विधानसभा में बिना किसी बड़े राजनीतिक दल की मूक सहमति, आशीर्वाद या फिर सीधे तौर पर भीतरघात के, 10 विधायकों को एक मंच पर लाना उतना ही असंभव है जितना रेगिस्तान में बर्फबारी. आखिर वो हिडन माननीय कौन हैं, जो इन बाहरी दिग्गजों का प्रस्तावक बनने के लिए अपनी अंतरात्मा को ताक पर रखकर तैयार बैठे हैं. क्या यह सत्ता और विपक्ष के भीतर सुलगते असंतोष का धुआं है, या फिर नोटों की गड्डियों की खनक, जिसने विधायकों की निष्ठा का तराजू झुका दिया है.
कांग्रेस में महामंथन या सिर्फ डर का प्रदर्शन
झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के साथ सरकार चला रही कांग्रेस की हालत इस वक्त हाथ कंगन को आरसी क्या जैसी हो गई है. डर का आलम यह है कि कांग्रेस ने आनन-फानन में फिर से विधायक दल की बैठक बुला ली है. क्या यह बैठक रणनीति बनाने के लिए है? या फिर अपने विधायकों को यह समझाने के लिए कि भाई, बिकना मत, कम से कम चुनाव तक तो नहीं. गठबंधन सरकार के पास नंबर गेम होने के बावजूद कांग्रेस का यह असमंजस और डर दिखाता है कि उन्हें अपने ही कुनबे पर भरोसा नहीं है. जब वोट के बदले नोट की थयोरी बाजार में तैरती है, तो सबसे पहले सेंधमारी का खतरा उसी दीवार पर होता है जो पहले से ही जर्जर हो.
भाजपा की रहस्यमयी चुप्पी
दूसरी तरफ, खुद को अनुशासित और दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी कहने वाली भाजपा ने अब तक अपने पत्ते नहीं खोले हैं. लेकिन कहानी में ट्विस्ट तब आता है जब भाजपा के डार्क हॉर्स प्लान के तहत गौरव वल्लभ गुपचुप तरीके से नामांकन पत्र खरीद लेते हैं, मगर पार्टी की तरफ से कोई आधिकारिक घोषणा नहीं होती. यह चुप्पी कोई मजबूरी नहीं, बल्कि भाजपा का प्लान-बी है. राजनीति में जब सीधे उंगली से घी न निकले, तो उंगली टेढ़ी करने की कला में भाजपा माहिर मानी जाती है. अधिकृत घोषणा में यह देरी अकारण नहीं है.
लोकतंत्र का शॉपिंग मॉल और लापता विचारधारा
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प और दुखद पहलू यह है कि इसमें विचारधारा नाम की चिड़िया कहीं उड़ गई है. जो विधायक कल तक एक-दूसरे को पानी पी-पीकर कोस रहे थे, वे आज राज्यसभा टिकट के खरीदारों की लिस्ट में प्रस्तावक बनने की होड़ में हैं. चुनाव यह तय नहीं करेगा कि दिल्ली के उच्च सदन में झारखंड की आवाज कौन बनेगा, बल्कि यह तय करेगा कि झारखंड के विधायकों की लॉयल्टी की कीमत इस बार बाजार में क्या चल रही है.
अगर बिना किसी घोषित समर्थन के निर्दलीय उम्मीदवार पर्चा भरने में कामयाब हो जाते हैं, तो समझ लीजिए कि झारखंड की राजनीति में नैतिकता का दिवाला और हॉर्स ट्रेडिंग का दिवाली सीजन शुरू हो चुका है. अब देखना यह है कि भाजपा का यह मौन व्रत किस निर्दलीय के सिर पर ताज सजाता है, और कांग्रेस की बैठकबाजी अपने कितने विधायकों का ईमान बचा पाती है. बहरहाल, जनता सब देख रही है और नेताजी बस प्रस्तावक की पर्ची गिन रहे हैं.
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