एक तरफ माटी और स्थानीयता का नैरेटिव, दूसरी तरफ नाथवानी का कॉरपोरेट मैनेजमेंट, अंडरकरंट राजनीति का लिटमस टेस्ट

Ravi Bharti Ranchi : झारखंड की सियासत में जब-जब परिमल नाथवानी का नाम गूंजता है, तब-तब स्थापित सियासी अंकगणित और अंतरात्मा की...

Ravi Bharti
Ranchi : झारखंड की सियासत में जब-जब परिमल नाथवानी का नाम गूंजता है, तब-तब स्थापित सियासी अंकगणित और अंतरात्मा की आवाज के बीच का फासला मिटने लगता है. साल 2008 में झामुमो के 17 विधायकों के बावजूद उनके उम्मीदवार को महज 8 वोट मिलना और नाथवानी का बाजी मार जाना, आज भी सूबे की राजनीति का सबसे बड़ा क्रॉस वोटिंग चैप्टर है. 2014 में भी उन्होंने बिना टक्कर के दिल्ली का टिकट कटाया था. अब, साल 2026 में परिमल नाथवानी की तीसरी बार धमाकेदार एंट्री ने झारखंड के इस सीधे-साधे दिख रहे राज्यसभा चुनाव को एक हाई-वोल्टेज पॉलिटिकल थ्रिलर में तब्दील कर दिया है. यह सिर्फ दो सीटों को भरने का चुनाव नहीं है, बल्कि झारखंड विधानसभा के भीतर बहने वाली अंडरकरंट राजनीति का लिटमस टेस्ट है.

‘चाणक्य नीति’ बनाम मैजिक नंबर

झारखंड विधानसभा के मौजूदा समीकरणों पर नजर डालें, तो मुकाबला बेहद दिलचस्प हो चुका है. राज्यसभा की एक सीट फतह करने के लिए 28 वोटों की जादुई संख्या की दरकार है. इस समय एनडीए (भाजपा, आजसू, जदयू और लोजपा) के पास कुल 24 विधायक हैं. यानी परिमल नाथवानी की जेब में 24 वोट तो सुरक्षित हैं, लेकिन दिल्ली की कुर्सी पक्की करने के लिए अब भी 4 वोटों का अकाल है. सवाल यही है कि ये चार बाहरी खेवनहार कौन होंगे. क्या वे नाथवाणी की नैया पार लगाएंगे या उन्हें बीच भंवर में ही छोड़ देंगे. यही 4 वोटों की कमी इस पूरे चुनाव का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट और क्रॉस वोटिंग की आशंकाओं का नया केंद्र बन चुकी है.

महागठबंधन निश्चिंत, पर खौफ बरकरार

81 सदस्यीय झारखंड विधानसभा में सत्ताधारी महागठबंधन के चेहरों पर फिलहाल मुस्कान है, लेकिन इतिहास को देखते हुए दिल की धड़कनें बढ़ी हुई हैं.सैद्धांतिक रूप से, महागठबंधन के पास अपने दोनों उम्मीदवारों को जिताने के लिए पर्याप्त और सुरक्षित संख्या बल (56 वोट) है. झामुमो अपने 28 वोट देने के बाद भी 6 अतिरिक्त वोट कांग्रेस को ट्रांसफर कर सकता है. जिससे कांग्रेस के भी 28 वोट पूरे हो जाते हैं. लेकिन राजनीति संभावनाओं का खेल है, और परिमल नाथवाणी इसी संभावना का दूसरा नाम हैं.

• महागठबंधन : कुल 56 विधायक, झामुमो के 34 वोट, 28 वोट के बाद छह अतिरिक्त वोट
• कांग्रेस के 16 वोट, झामुमो सहयोग से 28 पूरे
• राजद के चार वोट महागठबंधन के पाले में
• भाकपा माले के दो वोट, महागठबंधन के पाले में
• एनडीए के कुल 24 वोट. इसमें भाजपा के 21 आजसू, जदयू और लोजपा के एक-एक वोट सभी नाथवाणी के साथ
• अन्य : जेकेएलएम के एक वोट, फिलहाल तटस्थ

परदे के पीछे कमल का हाथ और 10 प्रस्तावकों का रहस्य

नाथवानी के वो 10 प्रस्तावक कौन हैं जिन्होंने उनके नाम पर मुहर लगाई. हालांकि भाजपा ने इस बार आधिकारिक तौर पर अपना कोई उम्मीदवार मैदान में नहीं उतारा है, लेकिन नाथवाणी के नामांकन के वक्त भाजपा के सभी विधायकों की मौजूदगी ने साफ कर दिया है कि परदे के पीछे की पटकथा भगवा खेमे द्वारा ही लिखी गई है. अगर भाजपा परोक्ष रूप से नाथवाणी के साथ खड़ी है, तो यह रणनीति बेहद सोची-समझी है. यदि नाथवाणी वो 4 वोट जुटाने में कामयाब रहे, तो यह सत्ताधारी महागठबंधन के किले में बड़ी सेंधमारी और विपक्षी खेमे की सबसे बड़ी जीत मानी जाएगी. इसके विपरीत, यदि वे फेल रहे, तो यह भाजपा समर्थित इस गुप्त रणनीति की करारी हार होगी.

मैं कभी बाहरी नहीं था, झारखंड मेरी कर्मभूमि है

नामांकन पत्र दाखिल करने के बाद परिमल नाथवाणी के तेवर और आत्मविश्वास देखने लायक थे। उन्होंने मीडिया से मुखातिब होते हुए कहा कि मैं झारखंड में पहले भी काम कर चुका हूं। इस बार मौका मिलेगा तो और ज्यादा काम करूंगा. मेरे संबंध सभी राजनीतिक दलों से हैं. मैं कभी बाहरी नहीं था, झारखंड मेरी कर्मभूमि है. मैं सबके साथ मिलकर काम करने वाला हूं. नामांकन से पहले मैं मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से मिला था, कांग्रेस नेताओं से मिला था और निर्दलीय विधायकों से भी मिला था. मैं यहां सबको जानता हूं. पहले भी मैं किसी पार्टी के लेवल से नहीं आया था, बल्कि दूसरे लोगों ने भी मुझे समर्थन दिया था। मैं अपनी जीत के प्रति 100 परसेंट कांफिडेंट हूं नाथवाणी का यह बयान साफ संकेत देता है कि उनके सियासी संपर्क केवल एनडीए तक सीमित नहीं हैं, बल्कि महागठबंधन के भीतर भी उनकी पैठ है.

रिसॉर्ट पॉलिटिक्स और अंडर द टेबल डीलिंग

अब जब तीर कमान से निकल चुका है और पर्चे दाखिल हो चुके हैं, तो मतदान के दिन तक का समय झारखंड की राजनीति के लिए किसी रैंसम पीरियड (बंधक काल) जैसा होने वाला है. रांची के सियासी गलियारों में अफवाहों और दावों का बाजार गर्म है. आने वाले कुछ दिनों में झारखंड की राजनीति में कई रंग देखने को मिल सकते हैं.
• रिसॉर्ट पॉलिटिक्स : विधायकों को टूट से बचाने के लिए सुरक्षित स्थानों पर भेजने की सुगबुगाहट.
• मान-मनौव्वल का दौर : नाराज या असंतुष्ट विधायकों को साधने की कोशिशें.
• अंडर द टेबल डीलिंग्स : बंद कमरों में नंबर गेम को अपने पक्ष में करने की रणनीतियां.

लिटमस टेस्ट: माटी का नैरेटिव बनाम कॉरपोरेट चाणक्य नीति

यह चुनाव अब एक बेहद कड़े वैचारिक और रणनीतिक मुकाबले में तब्दील हो चुका है. एक तरफ झारखंड की माटी से उपजा दलित, आदिवासी और स्थानीयता का नैरेटिव है. जिसके दम पर महागठबंधन अपनी एकजुटता का दावा कर रहा है. दूसरी तरफ, एनडीए समर्थित कॉरपोरेट मैनेजमेंट की वो चाणक्य नीति है जो ऐन वक्त पर हवा का रुख बदलने के लिए जानी जाती है. क्या महागठबंधन अपने कुनबे को पूरी तरह एकजुट रखकर नाथवाणी के चक्रव्यूह को तोड़ पाएगा? या फिर परिमल नाथवाणी इतिहास को दोहराते हुए एक बार फिर झारखंड की राजनीति में एक नया और अभूतपूर्व उलटफेर लिख देंगे? जवाब भविष्य के गर्भ में है, लेकिन इतना तय है कि झारखंड राज्यसभा चुनाव की यह जंग अब बेहद रोमांचक और अंतिम क्षण तक सांसें थामने वाली होने जा रही है.

 

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