हजारीबाग: कानूनी जीत के बाद भी बेबस परिवार, 34 साल की लड़ाई के बाद भी जमीन के लिए खा रहे दर-दर की ठोकरें

Hazaribagh: न्यायालय से इंसाफ मिलने के बावजूद एक पीड़ित परिवार को अपनी ही जमीन की सुरक्षा के लिए प्रशासनिक दफ्तरों के चक्कर...

Hazaribagh:  न्यायालय से इंसाफ मिलने के बावजूद एक पीड़ित परिवार को अपनी ही जमीन की सुरक्षा के लिए प्रशासनिक दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर होना पड़ रहा है. मामला हजारीबाग जिले के ईचाक प्रखंड अंतर्गत परासी गांव का है, जहां के निवासी बिनोद रजक और उनके परिवार ने उपायुक्त हजारीबाग को एक लिखित आवेदन सौंपकर न्याय की गुहार लगाई है. पीड़ित परिवार का आरोप है कि अदालत से उनके पक्ष में अंतिम फैसला आने के बावजूद कुछ स्थानीय लोगों द्वारा उनकी पुश्तैनी जमीन को लेकर जबरन विवाद खड़ा किया जा रहा है और उन्हें परेशान किया जा रहा है. परिवार ने जिला प्रशासन से इस मामले में तुरंत हस्तक्षेप करने, भूमि की सुरक्षा सुनिश्चित करने और जांच की मांग की है.

1954 से जुड़ा है जमीन का यह पूरा कानूनी इतिहास

सौंपे गए आवेदन के अनुसार, इस पूरे विवाद की जड़ें दशकों पुरानी हैं. पीड़ित परिवार की दादी स्वर्गीय मुटरी देवी के नाम पर मौजा परासी में खाता संख्या 326 के अंतर्गत प्लॉट संख्या 1688 एवं 1689 की कुल 57 डिसमिल भूमि की बंदोबस्ती वर्ष 1954-55 में ही की गई थी. इसके बाद कई वर्षों तक उक्त भूमि की सरकारी रसीद भी बकायदा कटती रही और परिवार का दावा है कि वे बेहद लंबे समय से इस भूमि पर शांतिपूर्ण ढंग से दखल-कब्जे में हैं.

तीन दशक की कानूनी लड़ाई में बीत गईं कई पीढ़ियां

बिनोद रजक ने बताया कि इस भूमि को लेकर वर्ष 1993 में एक टाइटल सूट संख्या 99/1993 दायर किया गया था. लगभग तीन दशकों तक चली लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद, वर्ष 2022 में इस मुकदमे का फैसला उनके पिता स्वर्गीय डोमन रजक के पक्ष में आया. इस फैसले को चुनौती देते हुए विरोधी पक्ष ने जो अपील दायर की थी, उसे भी इसी वर्ष 2026 में जिला जज की अदालत ने पूरी तरह खारिज कर दिया. पीड़ित परिवार का कहना है कि लगभग 34 वर्षों तक चली इस थका देने वाली कानूनी लड़ाई के दौरान उनके पिता और दो सगे भाइयों का असमय निधन हो गया, लेकिन इसके बावजूद वे न्याय की उम्मीद में आज भी संघर्ष कर रहे हैं.

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अंचल कार्यालय पर अनदेखी और दुर्व्यवहार का आरोप

आवेदन में कुछ स्थानीय लोगों पर सीधा आरोप लगाया गया है कि जो लोग पहले विरोधी पक्ष के समर्थन में अदालतों में गवाही दे रहे थे, वे अब इस निजी जमीन को जबरन सार्वजनिक भूमि घोषित कराने की कोशिश कर रहे हैं. रजक परिवार का आरोप है कि बीते 9 जून 2026 को वे अदालत के सभी आवश्यक और वैध दस्तावेजों के साथ अंचल कार्यालय ईचाक पहुंचे थे, लेकिन वहां तैनात प्रभारी अंचल अधिकारी ने उनकी बात सुनने से साफ इनकार कर दिया. इसके साथ ही परिवार की महिलाओं ने भी अंचल कार्यालय के कर्मियों पर बेहद गंभीर आरोप लगाए हैं. महिलाओं का कहना है कि सरकारी दफ्तर में न सिर्फ उनकी दलीलों को नजरअंदाज किया गया, बल्कि उनके साथ अपमानजनक व्यवहार भी किया गया. पीड़ित परिवार ने इसे सामाजिक और मानवीय संवेदनाओं के विपरीत बताते हुए जिला प्रशासन से इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है.

प्रशासनिक चुप्पी के बीच टिकी हैं उपायुक्त पर नजरें

परेशान और भयभीत परिवार ने उपायुक्त से अनुरोध किया है कि न्यायालय के आदेश का सम्मान करते हुए उनकी भूमि पर उनके कानूनी अधिकार की रक्षा की जाए. उन्होंने पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच कराने और अंचल कार्यालय के स्तर पर यदि किसी भी तरह की लापरवाही या पक्षपात हुआ है, तो संबंधित लोगों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई करने की मांग की है.

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