Saurav Singh
Ranchi : जिस खूंखार माओवादी नेता की रिहाई के बदले नक्सलियों ने झारखंड पुलिस के जांबाज इंस्पेक्टर फ्रांसिस इंदवार का अपहरण कर उनका गला काट दिया था, अब उसी माओवादी के परिजनों को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अनुसंधान पर पांच लाख रुपया का आर्थिक मुआवजा मिलेगा. 10 लाख के इनामी रहे मृत नक्सली चंद्र भूषण यादव उर्फ भूषण यादव के परिजनों को पांच लाख का आर्थिक मुआवजा दिया जाएगा. गृह, कारा एवं आपदा प्रबंधन विभाग ने इसके लिए महालेखाकार (एजी) से राशि स्वीकृत करने की अनुमति मांगी है.

मानवाधिकार आयोग की अनुशंसा पर लिया गया फैसला
मूल रूप से लातेहार जिला का रहने वाला माओवादी चंद्र भूषण यादव ने 19 सितंबर 2019 को गुमला में पुलिस के सामने आत्मसमर्पण किया था. इसके बाद उसे जेल भेज दिया गया. जहां साल 2021 में न्यायिक हिरासत के दौरान उसकी मौत हो गई थी. जेल में हुई इस मौत के बाद मानवाधिकार आयोग ने मामले का संज्ञान लिया और मृतक नक्सली के परिजनों को मुआवजा देने की अनुशंसा की. इसी आधार पर अब उसकी पत्नी राईला देवी को पांच लाख की आर्थिक सहायता देने की प्रक्रिया शुरू की गई है.

क्या थी साल 2009 की वह खौफनाक घटना, जब इंस्पेक्टर का मिला था सर कटा हुआ शव
इस पूरे मामले के तार साल 2009 की उस रोंगटे खड़े कर देने वाली घटना से जुड़ी है. जिसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था. यह घटना 30 सितंबर 2009 की थी. दोपहर के करीब 3:30 बज रहे थे. इसी समय स्पेशल ब्रांच के सीनियर पुलिस इंस्पेक्टर फ्रांसिस इंदुवार अपने कुछ करीबियों (अंथोनी गुड़िया, संजय सिंह, पंचायत सेवक मोलदेव राम और जूनियर इंजीनियर विनय सिन्हा) के साथ खूंटी जिले के अड़की थाना क्षेत्र स्थित हेंब्रम बाजार पहुंचे. जब वे सब्जी और घरेलू सामान खरीदकर अड़की जाने के लिए निकले, तभी घात लगाए बैठे तीन नक्सलियों ने उन्हें घेर लिया. नक्सलियों ने इंस्पेक्टर इंदुवार के साथ मारपीट की और उन्हें जबरन घसीटते हुए उत्तर दिशा में पीसीसी रोड से होते हुए जंगलों और पहाड़ियों की तरफ ले गए.
नक्सलियों ने रखी थी भूषण यादव समेत कैदियों की अदला-बदली’ की शर्त
छह अक्टूबर 2009 को मीडिया में प्रकाशित हुई एक रिपोर्ट के मुताबिक इंस्पेक्टर इंदवार के अपहरण के बाद नक्सलियों ने सरकार के सामने एक बड़ी शर्त रखी. उन्होंने इंस्पेक्टर की सुरक्षित रिहाई के बदले जेल में बंद अपने तीन बड़े माओवादी नेताओं की रिहाई की मांग की. इन तीन नेताओं में शामिल थे.
– कोबाड गांधी
– छत्रधर महतो
– चंद्र भूषण यादव
हालांकि तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने नक्सलियों के सामने झुकने और किसी भी तरह की कैदियों की अदला-बदली की मांग से साफ इनकार कर दिया था.

रांची-टाटा हाईवे पर मिली थी सर कटी लाश
सरकार द्वारा मांगें न माने जाने से बौखलाए नक्सलियों ने बेहद क्रूरता का परिचय दिया. अपहरण के कुछ दिनों बाद ही नक्सलियों ने इंस्पेक्टर फ्रांसिस इंदुवार का सर कलम कर (गला काटकर) उनकी हत्या कर दी. छह अक्टूबर 2009 को उनका क्षत-विक्षत और सर कटा शव रांची-टाटा हाईवे से बरामद किया गया था.

कौन था चंद्र भूषण यादव नक्सल कांड से आत्मसमर्पण तक का सफर
चंद्र भूषण यादव साल 1995 से ही माओवादी संगठन में सक्रिय था और कई बड़ी नक्सली घटनाओं में शामिल रहा. साल 2009 में जब संगठन उसकी रिहाई की मांग कर रहा था. तब दरअसल उसे पश्चिम बंगाल के कोलकाता बाजार से उस वक्त गिरफ्तार किया गया था, जब वह वहां इलाज कराने गया था. गिरफ्तारी के बाद उसे झारखंड लाकर गुमला और लोहरदगा जेल में रखा गया. साल 2015 में वह लोहरदगा जेल से जमानत पर बाहर आया. करीब तीन महीने तक घर पर रहने के बाद वह नवंबर 2015 में रिजनल कमांडर नकुल यादव के संपर्क में आया और दोबारा माओवादी संगठन में शामिल हो गया. इसके बाद उसने गुमला और बूढ़ा पहाड़ के इलाकों को अपना मुख्य कार्यक्षेत्र बनाया. लगातार बढ़ते पुलिसिया दबाव के बाद आखिरकार 19 सितंबर 2019 को उसने सरेंडर कर दिया. जिसके बाद 2021 में जेल के अंदर ही उसकी बीमारी या अन्य कारणों से मौत हो गई. चंद्रभूषण अपने साथियों के साथ सात बार पुलिस पार्टी पर जानलेवा हमला कर चुका था. साथ ही हथियार लूटने, बम विस्फोट, फायरिंग, विकास कार्यों में लगे मशीनों को आग के हवाले करने की घटना को भी अंजाम दिया था.
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