Hazaribagh : शहर ने सोमवार को एक ऐसा दृश्य देखा, जिसने आस्था, विश्वास और न्याय की उम्मीद को एक साथ जोड़ दिया. हजारीबाग के ऐतिहासिक बड़ा अखाड़ा मठ से 181 वर्षों बाद भगवान की विग्रह मूर्ति मंदिर परिसर से बाहर निकाली गई और न्याय की गुहार लेकर समाहरणालय पहुंची. यह केवल एक प्रशासनिक शिकायत नहीं थी, बल्कि अपने आराध्य को साक्षी मानकर न्याय की मांग करने का एक भावनात्मक और आध्यात्मिक प्रयास भी था. मठ के महंत विजयानंद दास भगवान की विग्रह मूर्ति को लेकर श्रद्धालुओं और अखाड़ा समिति के सदस्यों के साथ समाहरणालय पहुंचे. इस दौरान भक्ति, श्रद्धा और न्याय की अपेक्षा का अद्भुत संगम देखने को मिला. रास्ते भर श्रद्धालु भगवान के जयकारे लगाते रहे और मठ की जमीन से जुड़े विवादों के समाधान की प्रार्थना करते रहे.
जब भक्तों ने कहा- अब भगवान ही दिलाएंगे न्याय
महंत विजयानंद दास का कहना है कि मठ की भूमि से जुड़े मामलों को लेकर वे वर्ष 2022 से लगातार विभिन्न कार्यालयों और न्यायालयों का दरवाजा खटखटा रहे हैं. उनका आरोप है कि फर्जी जमाबंदी, एलपीसी निर्गत होने तथा जांच प्रक्रिया में विलंब के कारण अब तक न्याय नहीं मिल पाया है. उन्होंने भावुक स्वर में कहा कि जब वर्षों की कोशिशों के बाद भी समाधान नहीं मिला, तब भगवान को ही न्याय की गुहार लेकर प्रशासन के द्वार तक लाना पड़ा. उनके अनुसार यह कदम किसी विरोध का नहीं, बल्कि सत्य और न्याय की प्रार्थना का प्रतीक है.
उपायुक्त से मुलाकात, भगवान को बनाया साक्षी
समाहरणालय पहुंचने के बाद महंत विजयानंद दास ने उपायुक्त हेमंत सती से मुलाकात कर पूरे मामले की जानकारी दी. उन्होंने संबंधित दस्तावेज और अपनी शिकायतें उपायुक्त के समक्ष प्रस्तुत कीं. इस दौरान उपायुक्त ने मामले को गंभीरता से लेते हुए निष्पक्ष जांच का आश्वासन दिया. उन्होंने कहा कि शिकायत में उठाए गए सभी बिंदुओं की जांच कराई जाएगी और यदि किसी अधिकारी या कर्मचारी की लापरवाही अथवा अनियमितता सामने आती है तो नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी. साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि नियमों के विपरीत जमाबंदी या म्यूटेशन किया गया है तो दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा.
आस्था का संदेश बना चर्चा का विषय
भगवान की विग्रह मूर्ति के साथ समाहरणालय पहुंचने की घटना पूरे शहर में चर्चा का विषय बनी रही. बड़ी संख्या में लोग इसे आस्था और न्याय की पुकार के रूप में देख रहे हैं. कई श्रद्धालुओं का कहना था कि जब भक्तों को कहीं सुनवाई नहीं होती, तब वे अपने आराध्य को ही न्याय का साक्षी बनाते हैं.
श्रद्धालुओं की एक ही प्रार्थना- सत्य की हो जीत
कार्यक्रम में शामिल श्रद्धालुओं ने कहा कि उनकी मांग किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि सत्य और न्याय की स्थापना के लिए है. उन्होंने प्रशासन से निष्पक्ष जांच कर वास्तविक तथ्यों को सामने लाने की अपील की. 181 वर्षों बाद मंदिर से भगवान की विग्रह मूर्ति का इस प्रकार प्रशासनिक कार्यालय तक पहुंचना हजारीबाग के धार्मिक और सामाजिक इतिहास की एक अनोखी घटना बन गई है. यह घटना इस बात का भी प्रतीक है कि लोगों का विश्वास आज भी न्याय और प्रशासनिक व्यवस्था के साथ-साथ अपनी आस्था में अटूट बना हुआ है.
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