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गुमला में पहली बार खरपतवारनाशी-सहिष्णु धान सीआर धान 807 का वैज्ञानिक प्रदर्शन शुरू

Gumla: कृषि विज्ञान केंद्र गुमला, विकास भारती बिशुनपुर द्वारा वर्षा आधारित कृषि एवं बढ़ती श्रम लागत की चुनौतियों के बीच गुमला जिले...

Gumla: कृषि विज्ञान केंद्र गुमला, विकास भारती बिशुनपुर द्वारा वर्षा आधारित कृषि एवं बढ़ती श्रम लागत की चुनौतियों के बीच गुमला जिले में धान उत्पादन की नई तकनीक को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की गई है. जिले में पहली बार खरपतवारनाशी-सहिष्णु धान किस्म सीआर धान 807 का वैज्ञानिक प्रदर्शन प्रारंभ किया गया है. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अंतर्गत राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान द्वारा विकसित इस उन्नत किस्म का प्रदर्शन बिशुनपुर प्रखंड के शिवराजपुर, लुट्टोबारटोली, सरनाटोली, सालगी एवं नगर गांवों में 50 एकड़ क्षेत्र में किया जा रहा है. इसके लिए 50 चयनित किसानों को गुणवत्तायुक्त बीज एवं आवश्यक कृषि आदान उपलब्ध कराए गए हैं.

सीआर धान 807 देश की पहली गैर-जीएमओ (Non-GMO) खरपतवारनाशी-सहिष्णु गैर-बासमती धान किस्म है

कृषि विज्ञान केंद्र, गुमला के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रधान डॉ. बृजेश पांडेय ने बताया कि सीआर धान 807 देश की पहली गैर-जीएमओ (Non-GMO) खरपतवारनाशी-सहिष्णु गैर-बासमती धान किस्म है. इसे आधुनिक मार्कर-असिस्टेड बैकक्रॉस ब्रीडिंग तकनीक के माध्यम से विकसित किया गया है, जिससे इसमें इमाजेथापायर आधारित खरपतवारनाशी के प्रति सहनशीलता विकसित हुई है. इस तकनीक के कारण किसान प्रत्यक्ष बुवाई (Direct Seeded Rice-DSR) प्रणाली में प्रभावी खरपतवार नियंत्रण कर सकते हैं, जबकि धान की फसल सुरक्षित रहती है. इससे निराई-गुड़ाई पर होने वाला श्रम एवं खर्च काफी कम हो जाता है.

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पारंपरिक रोपाई की तुलना में कम पानी की मांग करती है

उन्होंने कहा कि प्रत्यक्ष बुवाई धान प्रणाली पारंपरिक रोपाई की तुलना में कम पानी की मांग करती है तथा खेतों में लगातार जलभराव की आवश्यकता नहीं होने के कारण मीथेन जैसी ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में भी कमी आती है. यह तकनीक जलवायु-स्मार्ट कृषि की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है. सीआर धान 807 विशेष रूप से वर्षा आधारित एवं ऊपरी भूमि क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है. इसमें सूखा सहनशीलता की उत्कृष्ट क्षमता पाई जाती है, जिससे कम नमी की परिस्थितियों में भी स्थिर उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है. यह किस्म 110 से 115 दिनों में पककर तैयार हो जाती है तथा इसकी औसत उत्पादकता 4.2 टन प्रति हेक्टेयर तक दर्ज की गई है.

उन्नत किस्में किसानों की उत्पादन लागत घटाने तथा आय बढ़ाने में महत्वपूर्ण

विकास भारती के संयुक्त सचिव महेंद्र भगत ने कहा कि झारखंड में श्रम संकट और अनिश्चित मानसून को देखते हुए ऐसी उन्नत किस्में किसानों की उत्पादन लागत घटाने तथा आय बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं. वहीं कृषि विज्ञान केंद्र के विषय वस्तु विशेषज्ञ ई. इनो राय ने बताया कि यह प्रदर्शन क्षेत्रीय परिस्थितियों में किस्म की अनुकूलता, उत्पादकता एवं आर्थिक लाभप्रदता का वैज्ञानिक मूल्यांकन करेगा. यदि परिणाम सकारात्मक रहे तो आने वाले वर्षों में इस तकनीक का विस्तार जिले के अधिक किसानों तक किया जाएगा, जिससे धान उत्पादन प्रणाली अधिक टिकाऊ, लाभकारी और जलवायु-अनुकूल बन सकेगी.

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