Ranchi : झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों के लिए चल रही सियासी जंग अब अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच चुकी है. 18 जून को सुबह नौ बजे से चार बजे तक विधानसभा भवन में वोट डाले जाएंगे. जिसके ठीक बाद शाम पांच बजे से वोटों की गिनती शुरू होगी. कागज पर सत्ताधारी गठबंधन का पलड़ा भारी है, लेकिन राज्यसभा की अनूठी वोटिंग प्रक्रिया और क्रॉस वोटिंग के अंदरूनी खतरे ने रांची के सियासी पारे को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि राज्यसभा चुनाव में पार्टियां भले ही व्हिप जारी कर दें, लेकिन विधायक मुख्य रूप से चार शातिर तरीकों से अपनी ही पार्टी को गच्चा देते आए हैं.
- पहला (सीधा बगावती रास्ता) : इसमें विधायक पार्टी के अधिकृत फरमान को सीधे दरकिनार करते हुए खुलेआम विरोधी उम्मीदवार के पक्ष में पहली वरीयता का वोट डाल देते हैं.
- दूसरा (एजेंट से आंख मिचौली) : नियमों के मुताबिक विधायकों को अपने दल के पोलिंग एजेंट को बैलेट पेपर दिखाना होता है. लेकिन क्रॉस वोटिंग करने वाले विधायक जानबूझकर एजेंट को बैलेट पेपर दिखाए बिना ही उसे मतपेटी में डाल देते हैं. हालांकि ऐसे मामलों में बाद में पार्टी कार्रवाई कर सकती है, लेकिन वोट काउंट हो जाता है.
- तीसरा (तकनीकी खेल – वोट रिजेक्ट कराना) : इस तरीके में विधायक अपनी पार्टी के दबाव से बचने के लिए पेन से टिक मार्क लगाने या वरीयता अंक लिखने में ऐसी जानबूझकर तकनीकी गलती कर देते हैं, जिससे उनका वोट अवैध घोषित हो जाए. इससे पार्टी का कुल वोट बैंक घट जाता है.
- चौथा (सदन से ‘रहस्यमयी’ तरीके से गायब होना) : वोटिंग के ठीक पहले या वोटिंग के दिन विधायक अचानक बीमारी या किसी अन्य बहाने से सदन से नदारद हो जाते हैं. इससे जीत के लिए आवश्यक न्यूनतम वोटों का ‘कोरम’ (कोटा) कम हो जाता है. जिसका सीधा फायदा विरोधी खेमे को मिलता है.
झारखंड में राज्यसभा चुनाव और विवादों का पुराना नाता
• साल 2012 का नोट कांड : इस साल झारखंड राज्यसभा चुनाव में बड़े पैमाने पर हॉर्स ट्रेडिंग की शिकायत के बाद चुनाव आयोग ने इतिहास में पहली बार पूरी चुनाव प्रक्रिया को ही रद्द कर दिया था. बाद में नए सिरे से मतदान कराया गया था.
• साल 2016 की क्रॉस वोटिंग : इस चुनाव में भी भारी सियासी उलटफेर देखने को मिला था. जब कांग्रेस और विपक्षी खेमे के कुछ विधायकों ने पार्टी लाइन से अलग जाकर भाजपा उम्मीदवार के पक्ष में क्रॉस वोटिंग कर दी थी. जिससे विपक्ष का गणित बिगड़ गया था.
• साल 2018 और 2020 की घेराबंदी : इन चुनावों में भी अंतिम समय तक रिजॉर्ट पॉलिटिक्स और विधायकों की बाड़ेबंदी देखने को मिली थी. छोटी पार्टियों और निर्दलीय विधायकों की भूमिका हमेशा से यहां निर्णायक और रहस्यमयी रही है.
सीटों का समीकरण : एनडीए को दरकार, गठबंधन तैयार
इस चुनावी रण में सत्ताधारी जेएमएम-कांग्रेस गठबंधन के पास 56 विधायकों का मजबूत समर्थन है. जो दोनों सीटों पर जीत के लिए संख्या बल के हिसाब से पूरी तरह पर्याप्त है. गठबंधन की ओर से झामुमो के बैजनाथ राम और कांग्रेस से प्रवण झा मैदान में हैं. दूसरी तरफ, एनडीए समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी के पास फिलहाल 24 विधायकों का ही समर्थन है. उन्हें अपनी नैया पार लगाने के लिए 4 और अतिरिक्त वोटों की सख्त जरूरत है. यही 4 वोटों का फासला इस चुनाव को सस्पेंस थ्रिलर बना रहा है.
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