विनीत आभा उपाध्याय
Ranchi\Delhi: झारखंड के सुरक्षित और संरक्षित वनों की सीमा के पास पत्थर खनन और स्टोन क्रशर लगाने की न्यूनतम दूरी तय करने का गंभीर मामला अब वापस झारखंड हाईकोर्ट पहुंच गया है. सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकान्त और जस्टिस वी. मोहाना की पीठ के समक्ष झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (JSPCB) ने अपनी विशेष अनुमति याचिका वापस ले ली है. शीर्ष अदालत ने याचिका को डिसमिस एज विड्रो करते हुए सभी पक्षों को हाईकोर्ट में ही अपनी दलीलें रखने की छूट दी है.

जनहित याचिका से शुरू हुआ विवाद
यह कानूनी लड़ाई झारखंड हाईकोर्ट में लंबित जनहित याचिका आनंद कुमार बनाम झारखंड सरकार से शुरू हुई है. याचिकाकर्ता ने राज्य सरकार के उस फैसले को चुनौती दी थी जिसमें वनों की सीमा से क्रशर और माइनिंग उद्योग की न्यूनतम दूरी (बफर जोन) को 400-500 मीटर से घटाकर सिर्फ 250 मीटर कर दिया गया था.
वनों और वन्यजीवों की सुरक्षा का मुद्दा
याचिकाकर्ता का तर्क था कि इससे वनों और वन्यजीवों को भारी नुकसान होगा इसलिए यह दूरी कम से कम 1 किलोमीटर होनी चाहिए वहीं दूसरी तरफ बोर्ड का तर्क था कि यह फैसला विशेषज्ञ समिति की राय पर लिया गया था. झारखंड हाईकोर्ट ने पर्यावरण सुरक्षा को तरजीह देते हुए 16 जनवरी 2026 को अंतरिम आदेश जारी कर सुरक्षित वनों के 1 किलोमीटर के दायरे में नई माइनिंग या क्रशर यूनिट की सहमति देने पर रोक लगा दी थी. जिसके बाद इस रोक को हटाने के लिए दायर अंतरिम आवेदनों (IA पिटीशन) को भी हाईकोर्ट ने 16 अप्रैल 2026 को खारिज कर दिया था.
हाईकोर्ट ने लगाई थी 1 किलोमीटर दायरे में रोक
हाईकोर्ट के इसी 1 किमी वाले कड़े प्रतिबंध के खिलाफ प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड सुप्रीम कोर्ट गया था. हालांकि 18 जून 2026 को सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान बोर्ड ने यह कहते हुए याचिका वापस ले ली कि मामला अभी हाईकोर्ट में अंतिम सुनवाई के लिए लंबित है. अब इस बफर जोन विवाद का अंतिम फैसला झारखंड हाईकोर्ट द्वारा किया जाएगा जिसपर राज्य के पर्यावरण और हजारों कारोबारियों का भविष्य टिका है.


