Manish Bhardwaj
Ranchi: झारखंड में इन दिनों विरोध, नाराजगी और जिद का एक नया और खतरनाक तरीका तेजी से सामने आ रहा है. अब लोग अपनी बात मनवाने के लिए दफ्तरों, थानों या पंचायतों के चक्कर काटने के बजाय सीधे मोबाइल टावर और हाईटेंशन बिजली टावर पर चढ़ जा रहे हैं. जमीन विवाद हो, प्रेम-प्रसंग हो, शादी का मामला हो या पारिवारिक झगड़ा हर तरह की नाराजगी का नया मंच अब टावर बनता जा रहा है.

54 दिनों में 11 मामले आए सामने
मई 2026 से 23 जून 2026 तक झारखंड में ऐसे 11 मामले सामने आ चुके हैं. यानी सिर्फ 54 दिनों में 11 लोग अपनी मांग मनवाने के लिए टावर पर चढ़ गए. वजहें अलग-अलग रहीं, लेकिन तरीका एक ही टावर पर चढ़ो और सिस्टम को नीचे बुलाओ.
कहीं जमीन, कहीं प्यार, कहीं शादी… लेकिन रास्ता एक
इन घटनाओं पर नजर डालें तो तस्वीर और चिंताजनक दिखती है. हजारीबाग में दाखिल-खारिज में देरी से परेशान युवक मोबाइल टावर पर चढ़ गया. बोकारो के नावाडीह में पुश्तैनी जमीन में हिस्सा नहीं मिलने पर युवक टावर पर जा बैठा. गढ़वा में प्रेम-प्रसंग को लेकर नाराज युवक टावर पर चढ़ गया. रांची में एक युवती सिर्फ इसलिए टावर पर चढ़ गई क्योंकि उसके नाबालिग प्रेमी ने उससे बात करना बंद कर दिया था. धनबाद में प्रेमी की गिरफ्तारी के विरोध में युवती टावर पर चढ़ गई. गढ़वा के रंका में सगाई टूटने और शादी नहीं होने से नाराज युवक 500 फीट ऊंचे टावर पर जा पहुंचा. इसके अलावा गोमिया, चंद्रपुरा, धालभूमगढ़, निमियाघाट और इटकी से भी ऐसे मामले सामने आए. वजहें भले बदलती रहीं, लेकिन हर घटना का मैसेज एक ही था—अगर बात नहीं सुनी जा रही, तो टावर पर चढ़ जाओ.
‘कॉपीकैट ट्रेंड’ बनता जा रहा है मामला
सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि यह अब सिर्फ गुस्से या सनक में उठाया गया कदम नहीं रह गया है. यह धीरे-धीरे कॉपीकैट ट्रेंड बनता दिख रहा है. एक घटना देखकर दूसरे लोग भी वही तरीका अपना रहे हैं. लोगों को लगने लगा है कि टावर पर चढ़ते ही पुलिस दौड़ पड़ेगी, प्रशासन हरकत में आ जाएगा, मीडिया पहुंच जाएगी, भीड़ लग जाएगी और घर वाले भी समझौते के लिए तैयार हो जाएंगे. यानी समाज में एक खतरनाक संदेश फैल रहा है, शांति से कहने पर बात न सुने, तो टावर पर चढ़ जाओ.
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सिर्फ ड्रामा नहीं, समाज की बेचैनी का संकेत
इन घटनाओं को सिर्फ सनसनी या नाटक मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. इसके पीछे समाज के भीतर बढ़ती हताशा, बेचैनी, संवादहीनता और दबाव बनाकर काम निकलवाने की मानसिकता साफ दिखाई देती है.
- जमीन के मामलों में प्रशासनिक देरी
- पारिवारिक विवादों में संवाद का टूटना
- प्रेम-प्रसंगों में भावनात्मक अस्थिरता
- छोटी मांगों को भी जिद में बदल देने की प्रवृत्ति
- इन सबने मिलकर इस ‘टावर ट्रेंड’ को हवा दी है.
एक की जिद, पूरे सिस्टम की परेशानी
हर ऐसी घटना में सिर्फ एक व्यक्ति की जान जोखिम में नहीं पड़ती, बल्कि पूरा प्रशासनिक तंत्र घंटों तक उलझ जाता है. पुलिस को मौके पर पहुंचकर समझाना पड़ता है, बिजली विभाग को सप्लाई रोकनी पड़ती है, स्थानीय लोग तमाशबीन बनकर भीड़ लगा लेते हैं और पूरे इलाके में अफरा-तफरी मच जाती है. कई बार घंटों मशक्कत के बाद लोगों को नीचे उतारा गया है. जरा सी चूक किसी बड़े हादसे में बदल सकती है. खासकर हाईटेंशन बिजली टावर पर चढ़ना तो सीधे मौत को दावत देना है.


