Hazaribagh: बादम और गोंदलपूरा पंचायत के ग्रामीणों ने जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए एक अनोखा एवं शांतिपूर्ण जनआंदोलन शुरू किया है. इस आंदोलन के माध्यम से ग्रामीण अपनी मातृभूमि, पर्यावरण और अस्तित्व की रक्षा के लिए एकजुटता का प्रदर्शन कर रहे हैं. प्रतिदिन रात 8 बजे से 8:15 बजे तक गांव के लोग अपने-अपने घरों की छतों, आंगनों और दरवाजों पर खड़े होकर शंख, थाली, ढोलक, टीन और अन्य पारंपरिक साधन बजाकर अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं.
रोशनी और आवाज से दर्ज हो रहा विरोध
ग्रामीण केवल पारंपरिक वाद्य यंत्रों के माध्यम से ही नहीं, बल्कि टॉर्च और मोबाइल की रोशनी जलाकर भी अपना विरोध दर्ज करा रहे हैं. उनका कहना है कि यह रोशनी उनके संघर्ष, जागरूकता और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को बचाने के संकल्प का प्रतीक है. गांवों में हर शाम उठने वाली यह सामूहिक आवाज अब जनआंदोलन का रूप लेती जा रही है.


“यह किसी व्यक्ति का नहीं, अस्तित्व बचाने का आंदोलन”
ग्रामीणों का कहना है कि यह आंदोलन किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि जल, जंगल, जमीन, संस्कृति, पहचान और अस्तित्व को बचाने की सामूहिक लड़ाई है. उनका मानना है कि प्रकृति और भूमि से उनका जीवन जुड़ा हुआ है और इसके संरक्षण के लिए वे लगातार संघर्ष करते रहेंगे. ग्रामीणों ने कहा कि जब हर घर से एक साथ आवाज उठेगी, तब उनकी मांगों को अनसुना करना संभव नहीं होगा. आंदोलन के दौरान गांवों में “जल-जंगल-जमीन हमारी है, इसकी रक्षा जिम्मेदारी हमारी है”, “मांय-माटी के सम्मान में, हम सब एक मैदान में” और “नहीं झुकेंगे, नहीं रुकेंगे, अपने अधिकारों के लिए लड़ते रहेंगे” जैसे नारे भी गूंज रहे हैं.

कंपनियों को जमीन नहीं देने का ऐलान
आंदोलन में शामिल ग्रामीणों ने स्पष्ट रूप से कहा कि वे बीजीआर, अडानी और जेएसडब्ल्यू जैसी कंपनियों को अपनी जमीन नहीं देंगे. उनका आरोप है कि औद्योगिक परियोजनाओं के नाम पर उनकी कृषि भूमि, जंगल और प्राकृतिक संसाधनों पर खतरा मंडरा रहा है. ग्रामीणों का कहना है कि विकास की कीमत पर उनका अस्तित्व समाप्त नहीं किया जा सकता.
पर्यावरण संरक्षण का दिया संदेश
ग्रामीणों ने कहा कि धरती पर जीवन की बुनियाद जल, जंगल और जमीन हैं. जल प्यास बुझाता है, जंगल जीवनदायी सांसें देता है और जमीन लोगों के जीवन-यापन का आधार है. यदि इन संसाधनों का अंधाधुंध दोहन हुआ तो आने वाली पीढ़ियों के लिए गंभीर संकट उत्पन्न हो जाएगा. उन्होंने लोगों से प्रकृति संरक्षण को लेकर जागरूक होने की अपील की.
विरोध का बना नया प्रतीक
बादम और गोंदलपूरा पंचायत में शुरू हुआ यह आंदोलन अब विरोध के एक नए और शांतिपूर्ण तरीके के रूप में चर्चा का विषय बन गया है. बिना किसी हिंसा या टकराव के ग्रामीण सामूहिक रूप से अपनी बात सरकार और संबंधित कंपनियों तक पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं. शंख, थाली और रोशनी के जरिए चल रहा यह अभियान क्षेत्र में जनएकता और अधिकारों की लड़ाई का प्रतीक बनता जा रहा है.


