विनीत आभा उपाध्याय
Ranchi: झारखंड के बोकारो जिले में करोड़ों रुपये के हाई-प्रोफाइल ट्रेजरी घोटाला की जांच सीआईडी कर रही है. सीआईडी की अब तक की जांच में यह चौंकाने वाली बात सामने आई है कि इस पूरे महाघोटाले के केंद्र में झारखंड पुलिस के एक सेवानिवृत्त (रिटायर्ड) सब-इंस्पेक्टर उपेंद्र सिंह का नाम है. हालांकि जांच में अब तक उपेंद्र सिंह की कोई प्रत्यक्ष संलिप्तता या भूमिका सामने नहीं आई है बल्कि मुख्य आरोपी ने उन्हें इस घोटाले में एक मोहरा (जरिया) बनाया था. सीआईडी को मिले सबूतों के मुताबिक सब-इंस्पेक्टर उपेंद्र सिंह जुलाई 2016 में ही सेवा से रिटायर हो चुके थे. नियम के मुताबिक रिटायरमेंट के बाद उनका वेतन बंद हो जाना चाहिए था. लेकिन बोकारो एसपी ऑफिस में तैनात अकाउंटेंट कौशल कुमार पांडेय की नजर उनके दस्तावेजों पर थी. मुख्य आरोपी कौशल ने डिजिटल सिस्टम में सेंध लगाकर उपेंद्र सिंह के सरकारी दस्तावेजों और जन्मतिथि के साथ भारी छेड़छाड़ की. उसने कागजों में उपेंद्र सिंह की रिटायरमेंट की उम्र को बढ़ाकर मार्च 2026 कर दिया, जिससे वे सरकारी सिस्टम में एक सक्रिय कर्मचारी दिखाई देते रहें. अकाउंटेंट कौशल कुमार पांडेय ने इस धोखाधड़ी को अंजाम देने के लिए उपेंद्र सिंह के जनरल प्रोविडेंट फंड नंबर SWN/POL/291 का गलत इस्तेमाल किया. उपेंद्र सिंह का वास्तविक बैंक खाता संख्या 11475777291 था, लेकिन आरोपी ने कंप्यूटर सिस्टम में छेड़छाड़ कर इस असली खाते को सिस्टम से डिलीट कर दिया और इसके बाद उसने अपनी पत्नी अन्नू पांडेय का बैंक खाता संख्या 42945898462 दर्ज कर दिया, ताकि सरकारी खजाने से निकलने वाला पैसा सीधे उसके घर पहुंच सके. उपेंद्र सिंह को मार्च 2026 तक कार्यरत दिखाकर आरोपी ने उनके वेतन के मद से कुल 4 करोड़ 29 लाख रुपए से अधिक की राशि बोकारो ट्रेजरी से निकाल ली और यह पूरी रकम किस्तों में उसकी पत्नी के खाते में ट्रांसफर होती रही.
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कब-कब निकाले गये पैसे
वित्तीय वर्ष 2023-2024 में उपेंद्र सिंह के नाम पर 3 बार में 28,25,808 रुपए की अवैध निकासी की गई.
वित्तीय वर्ष 2024-2025 में सबसे ज्यादा 31 बार में 1,65,81,668 रुपए निकाले गए.
वित्तीय वर्ष 2025-2026 में 2,35,63,531 की अवैध निकासी को अंजाम दिया गया.
सरकारी खजाने में इतनी बड़ी सेंधमारी के बाद अब अपराध अनुसंधान विभाग (CID) इस पूरे मामले की गहन जांच कर रही है. सीआईडी इस बिंदु पर फोकस कर रही है कि आखिर इतने लंबे समय तक डिजिटल सिस्टम में यह फर्जीवाड़ा कैसे चलता रहा और विभाग के किन अधिकारियों या कर्मचारियों की लापरवाही या मिलीभगत के कारण ट्रेजरी से आंख मूंदकर करोड़ों रुपये पास होते रहे.


