Chaiti Chhath 2026: कब से शुरू होगा चैती छठ, जानिए चार दिन के पर्व की पूरी तिथि और कैलेंडर

Chaiti Chhath 2026: छठ पूजा सूर्य उपासना, आस्था और कठिन तपस्या का महापर्व माना जाता है. इसे हिंदू धर्म के सबसे कठिन...

चैती छठ/ एआई इमेज

Chaiti Chhath 2026: छठ पूजा सूर्य उपासना, आस्था और कठिन तपस्या का महापर्व माना जाता है. इसे हिंदू धर्म के सबसे कठिन व्रतों में से एक माना जाता है, क्योंकि इसमें व्रती को लगभग 36 घंटे तक निर्जला उपवास रखना पड़ता है. चार दिनों तक चलने वाले इस पर्व की शुरुआत नहाय-खाय से होती है और अंतिम दिन उगते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद व्रत का समापन होता है. साल में दो बार मनाया जाने वाला यह पर्व कार्तिक महीने के साथ-साथ चैत्र महीने में भी मनाया जाता है. चैत्र मास में पड़ने वाली छठ पूजा चैती छठ कहा जाता है. इस पर्व में भक्त सूर्य देव और छठी मैया की पूजा कर परिवार की सुख-समृद्धि और स्वास्थ्य की कामना करते हैं.

चैती छठ 2026 कब से शुरू होगा?

पंचांग के अनुसार चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से छठ पर्व की शुरुआत होती है और यह सप्तमी तिथि तक चलता है. साल 2026 में चैती छठ 22 मार्च से शुरू होकर 25 मार्च 2026 तक मनाया जाएगा. इन चार दिनों में अलग-अलग धार्मिक अनुष्ठान और परंपराएं निभाई जाती हैं.

चैती छठ पूजा 2026 का पूरा कैलेंडर

पहला दिन 22 मार्च: नहाय-खाय से होती है छठ पर्व की शुरुआत

छठ पर्व का पहला दिन नहाय-खाय कहलाता है. इस दिन व्रती सुबह किसी नदी, तालाब या पवित्र जलाशय में स्नान करते हैं. इसके बाद घर में शुद्ध और सात्विक भोजन बनाया जाता है. इस दिन विशेष रूप से कद्दू, चना दाल और अरवा चावल का भात तैयार किया जाता है. इसे प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है. नहाय-खाय का उद्देश्य शरीर और मन को आने वाले कठिन व्रत के लिए तैयार करना होता है.

दूसरा दिन 23 मार्च: खरना के साथ शुरू होता है 36 घंटे का निर्जला व्रत

छठ पर्व का दूसरा दिन खरना कहलाता है. कई जगहों पर इसे लोहंडा भी कहा जाता है. इस दिन व्रती पूरे दिन उपवास रखते हैं और सूर्यास्त के बाद पूजा-अर्चना करते हैं. पूजा के बाद गुड़ की खीर, रोटी या पुड़ी और केला का प्रसाद ग्रहण किया जाता है. खरना के बाद से ही 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू हो जाता है.

तीसरा दिन 24 मार्च: संध्या अर्घ्य का विशेष महत्व

छठ पूजा के तीसरे दिन संध्या अर्घ्य दिया जाता है. इस दिन श्रद्धालु नदी, तालाब या घाट पर जाकर डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य अर्पित करते हैं. व्रती कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्य देव को दूध और जल से अर्घ्य देते हैं. साथ ही बांस की टोकरी या सूप में ठेकुआ, मौसमी फल, गन्ना और नारियल आदि प्रसाद के रूप में अर्पित किए जाते हैं.

चौथा दिन 25 मार्च: उषा अर्घ्य के साथ होता है व्रत का समापन

छठ पर्व का अंतिम दिन उषा अर्घ्य का होता है. इस दिन सूर्योदय से पहले घाटों पर पहुंचकर उगते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है. इसे उदयागामी अर्घ्य भी कहा जाता है. सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित करने के बाद व्रती अपने 36 घंटे के निर्जला व्रत का पारण करते हैं और छठ पर्व का समापन होता है. छठ पूजा सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आस्था, प्रकृति और सूर्य उपासना का अनूठा पर्व है. इसमें पूरे परिवार और समाज की सहभागिता देखने को मिलती है, जो इसे और भी विशेष बनाती है.

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