रांची नगर निगम का एजेंडा-एक्जिबिशन, फाइलें अलमारी की शोभा बनीं, जनता की उम्मीदों का हुआ द एंड, सियासत जीती, शहर हार गया

Shreya Gupta Ranchi: यह लोकतंत्र है या अखाड़ा, यह जनसेवा का मंच है या अपनी राजनीति चमकाने का रणक्षेत्र. पिछले दिनों हुई...

Shreya Gupta

Ranchi: यह लोकतंत्र है या अखाड़ा, यह जनसेवा का मंच है या अपनी राजनीति चमकाने का रणक्षेत्र. पिछले दिनों हुई रांची नगर निगम के बोर्ड की बैठक में जनता के 25 बहुप्रतीक्षित एजेंडे ठंडे बस्ते की भेंट चढ़ गए. राजधानी रांची के नागरिकों को लगा था कि अब निगम की बैठक में सड़कों, पानी, रोशनी और साफ-सफाई पर मंथन होगा, लेकिन वहां तो मंजन’ हुआ. पार्षदों ने फंड न मिलने का राग अलापा, किसी ने अपनी राजनीतिक रोटियां सेकीं, और नतीजा वही ढाक के तीन पात. वे 25 एजेंडे जो शहर की तस्वीर बदल सकते थे, लेकिन निगम की फाइलों में कैद होकर रह गए.

एजेंडा नंबर 04, 05 और 10, विकास की धरातल और फंड का मायाजाल

निगम की सबसे बड़ी बीमारी वित्तीय पारदर्शिता है. 1 मार्च 2026 के बाद निगम के खजाने में किस मद में कितनी राशि बची है, यह जानने की ललक जनता में है, लेकिन बोर्ड इसे साझा करने में क्यों कतरा रहा है? पिछले तीन वर्षों का ब्यौरा मांगना कोई गुनाह नहीं है, लेकिन इस पर चर्चा तक नहीं हुई. ट्रैक्टरों की संख्या, मजदूरों की तादाद और फंड का हिसाब ये वो बुनियादी सवाल थे जो निगम की कार्यक्षमता का आईना थे, लेकिन हंगामे के शोर में इन सवालों की आवाज दब गई.

एजेंडा 07 और 23, अंधेरे में डूबा शहर और विज्ञापनों का खेल

शहर की मुख्य सड़कों पर लगे लाइट बोर्ड और विज्ञापन निगम के लिए कमाई का जरिया हो सकते थे, लेकिन वे आज भी ज्यों के त्यों खड़े हैं. उधर, स्ट्रीट लाइट के रख-रखाव के लिए जुडको के साथ त्रिपक्षीय एकरारनामा का एजेंडा भी धूल फांकता रहा. निगम के गलियारों में चर्चा तो बहुत है, पर शहर की गलियां आज भी अंधेरे का दंश झेलने को मजबूर हैं. सीसीएमएस सिस्टम लगाने का सपना, सपना ही रह गया.

एजेंडा 11, 27 और 28, पेयजल की प्यास और बस स्टैंड की बदहाली

टैंकर भरने के लिए संप और कुओं का निर्माण एक प्राथमिक आवश्यकता थी. प्याउ-सराय के रखरखाव पर लाखों का खर्च हुआ, पर धरातल पर प्याऊ गायब हैं. खादगढ़ा और आईटीआइ बस स्टैंड का निर्माण जिस गति से चल रहा है, उससे तो लगता है कि यात्रियों को बस पकड़ने के लिए नहीं, बल्कि धूल फांकने के लिए वहां जाना पड़ता है. इन पर ठोस निर्णय की उम्मीद थी, लेकिन बैठक की समाप्ति के साथ ही यह उम्मीद भी समाप्त हो गई.

एजेंडा 06, 09, 12 और 16, स्वच्छता और कर्मचारी के साथ व्यवस्था का बुरा हाल

स्वच्छता कॉरपोरेशन का काम शहर को चमकाना था, लेकिन पार्षदों की समीक्षा बैठक की चर्चा तक सीमित रह गई. दैनिक वेतनभोगी, स्थायी कर्मचारी और जोनल सुपरवाइजरों के पास उपलब्ध संसाधनों की सूची सदन में नहीं आ सकी. वर्ष 2010 के बाद के संविदा कर्मियों का मुद्दा तो ऐसा है, जिसे उठाकर नेता अपनी सुविधा अनुसार राजनीति करते हैं, समाधान किसी को नहीं चाहिए.

एजेंडा 14, 18, 20 और 21, सुविधाएं, भवन और आम नागरिक

महापौर के पत्र के बावजूद वार्ड पार्षदों को मिलने वाला ईंधन भत्ता और स्टेशनरी जैसी बुनियादी सुविधाएं भी पेंडिंग पड़ी हैं. सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद भी पाथवे का निर्माण और पैदल चलने वालों के लिए फुटपाथ की समस्या जस की तस है. सामुदायिक भवनों का शुल्क निर्धारण और ऑनलाइन बुकिंग ऐप की बात तो सिर्फ डिजिटल इंडिया’ की मार्केटिंग जैसा लगता है, हकीकत में बुकिंग के लिए आज भी दौड़-धूप करनी पड़ती है. घर में 4 इंच बोरिंग के लिए शुल्क निर्धारण का एजेंडा भी फाइलों के बोझ तले दब गया.

एजेंडा 17, 19, 24 और 26, शेष रह गए प्रशासनिक और विकास कार्य

एनबीसीसी द्वारा प्रस्तावित भूमि पर निर्माण, अर्बन चैलेंज फंड के तहत योजनाओं का चयन, और एनयूएलएम कोषांग के प्रस्ताव, ये सब शहर के विकास की धमनियां थे. रातू रोड का नामकरण और अन्य विकास कार्य सिर्फ कागजों की शोभा बढ़ाते रहे. एक तरफ रांची का आम नागरिक गड्ढों भरी सड़कों, पानी के संकट और अंधेरी गलियों से लड़ रहा है, दूसरी तरफ बोर्ड की बैठक में फाइलों पर धूल जमा हो रही है.

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