Click Here
Click Here
Click Here

शादी हुए एक महीने की दुल्हन का इंतजार, तीन माह के बच्चे की किलकारी, वादा था शनिवार को लौटने का, पर सड़क पर थम गया खुशियों का कारवां

Ranchi: जो रात लोगों के जीवन में मुहर्रम की मजलिसों का राग छेड़ने के लिए बनी थी, वह इन आठ परिवारों के...

Ranchi: जो रात लोगों के जीवन में मुहर्रम की मजलिसों का राग छेड़ने के लिए बनी थी, वह इन आठ परिवारों के लिए अनंत अंधकार की रात साबित हुई. बिहार के मुजफ्फरपुर में अपनी कला का हुनर दिखाने की हसरत लिए निकले आठ कलाकारों का कारवां, रास्ते में ही मौत के आगोश में समा गया. बारलौंग की उस काली रात ने केवल आठ लोगों की जान नहीं ली, बल्कि उन आठ घरों की उन उम्मीदों को भी कुचल दिया, जो इन कलाकारों की मेहनत की कमाई पर टिकी थीं.

एक महीने पहले ही तो सजा था उनका घर

हेमंत महतो का घर, जहां अभी तक शादी की खुशियों की महक भी नहीं मिटी थी, आज वहां मातम की राख बिखरी है. एक महीने पहले हाथ थामकर जो वादा किया था, वह अब कभी पूरा नहीं होगा. पत्नी की सूनी मांग और मां की सूजी हुई आंखें उस अधूरी दास्तान की गवाह हैं जो शनिवार की वापसी के वादे के साथ शुरू हुई थी.

तीन महीने के बच्चे की अनजानी तड़प

अनोद कुमार की कहानी सबसे अधिक दिल दहला देने वाली है. घर में तीन महीने के मासूम बेटे की किलकारी गूंज रही थी, पिता ने जिसे गोद में लेकर खिलौने लाने का सपना देखा था. चार साल की बेटी आज दरवाजे पर टकटकी लगाए पिता के आने का इंतज़ार कर रही है, जिसे यह भी नहीं पता कि उसके सिर से ‘पिता’ का साया हमेशा के लिए उठ चुका है.

Read Also: आखिर क्या है रुगड़ा? क्यों कहा जाता है झारखंड के ‘जंगल का सोना’? 

सन्नाटे में लिपटी बस्ती

पवन करमाली और अविवाहित डेविड की मौत ने पूरे गांव को एक अजीब से सन्नाटे में डुबो दिया है. पवन की पत्नी का सदमा इतना गहरा है कि उसके आंसू भी अब सूख चुके हैं. जो लोग मुहर्रम की मजलिसों में लोगों को गम में शरीक करने के लिए निकले थे, आज वे खुद एक ऐसी कहानी बन गए हैं जिसे सुनकर हर किसी का सीना फट रहा है.

आजीविका का अंतिम सुर भी खामोश

ये कलाकार केवल वाद्य यंत्र नहीं बजाते थे, वे अपने परिवारों के जीवन की डोर थामे हुए थे. इनकी मौत से परिवारों का आर्थिक आधार भी ढह गया है. गरीबी और बेबसी के इस मंजर ने इन आठ घरों को सड़क पर ला खड़ा किया है. अब इन घरों में केवल उन कलाकारों के इस्तेमाल किए हुए बैंड-ताशा के उपकरण बचे हैं, जिनकी खामोशी इन परिवारों की बर्बादी का सबसे बड़ा सबूत है.आज रामगढ़ और हजारीबाग की हवाओं में केवल मातम है. कुदरत का यह कैसा क्रूर खेल है कि जो दुनिया को खुशियां सुनाने निकले थे, वे आज खुद एक कभी न खत्म होने वाला मातम छोड़ गए.

add1
सम्बंधित ख़बरें

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *