Ranchi: झारखंड के सरकारी अस्पतालों में स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर और सुदृढ़ बनाने की दिशा में राज्य सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है. स्वास्थ्य, चिकित्सा शिक्षा एवं परिवार कल्याण विभाग ने वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए राज्य योजना के तहत विभिन्न जिलों के अस्पतालों, स्वास्थ्य केंद्रों और औषधालय कार्यालयों में आउटसोर्सिंग के जरिए ली जाने वाली सेवाओं के लिए 2 अरब 74 करोड़ 57 लाख रुपये की भारी-भरकम राशि आवंटित की है. बजट का एक बड़ा हिस्सा राज्य के विभिन्न जिलों में जरूरत के अनुसार वितरित किया गया है, ताकि सुदूर क्षेत्रों तक स्वास्थ्य सेवाएं सुचारू रूप से चल सके. आवंटन सूची के अनुसार, राजधानी रांची को सबसे अधिक 47.30 करोड़ की राशि मिली है. इसके अलावा हजारीबाग को 21.98 करोड़, पलामू को 19.70, गिरिडीह को 19.50, गुमला को 19.15, दुमका को 14.51 और जमशेदपुर (पूर्वी सिंहभूम) को 10.63 करोड़ आवंटित किए गए हैं. हालांकि, इस विशेष आवंटन सूची से देवघर और बोकारो जिलों को अलग रखा गया है. इस राशि का उपयोग मुख्य रूप से अस्पतालों की साफ-सफाई, सुरक्षा, चिकित्सा जांच (डायग्नोस्टिक) और अन्य आवश्यक मैनपावर की जरूरतों को पूरा करने के लिए किया जाएगा.
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पाई-पाई का सही हिसाब रखने के लिए कड़े नियम
बजट जारी करने के साथ ही सरकार ने जनता के पैसे की पाई-पाई का सही हिसाब रखने और भ्रष्टाचार पर पूरी तरह लगाम लगाने के लिए बेहद कड़े नियम लागू किए हैं. नए निर्देशों के तहत, आउटसोर्सिंग पर तैनात होने वाले हर एक कर्मचारी की बायोमेट्रिक हाजिरी अनिवार्य कर दी गई है. संबंधित अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्र के प्रभारी अधिकारी को हर महीने यह लिखित प्रमाण देना होगा कि कर्मचारी वास्तव में ड्यूटी पर तैनात थे, और इसी डिजिटल अटेंडेंस के आधार पर ही एजेंसियों को भुगतान किया जाएगा. इस कड़े कदम से कागजों पर फर्जी कर्मचारी दिखाकर पैसे ऐंठने वाले सिंडिकेट पर पूरी तरह से रोक लगेगी.
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फिजूलखर्ची रोकने के सख्त निर्देश
सरकार ने फिजूलखर्ची रोकने के लिए यह भी साफ कर दिया है कि अस्पतालों में कर्मचारियों की संख्या वहां आने वाले मरीजों की तादाद और वास्तविक जरूरत के आधार पर ही तय होगी. किसी भी परिस्थिति में अनावश्यक रूप से बाहरी कर्मियों की सेवा नहीं ली जा सकेगी. यदि नियमों की अनदेखी कर कोई भी फालतू खर्च किया जाता है, तो इसके लिए संबंधित संस्थान के सिविल सर्जन या अधीक्षक को सीधे तौर पर व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार माना जाएगा और उनके खिलाफ विभागीय व दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी. पारदर्शिता बनाए रखने के लिए हर महीने की 10 तारीख तक खर्च की रिपोर्ट विभाग को भेजनी होगी और हर तीन महीने में महालेखाकार से इसका विधिवत ऑडिट भी कराया जाएगा.


