Hazaribag: हजारीबाग नगर निगम की चकाचौंध, दीवारों पर हुई नई पेंटिंग और स्वच्छता के नाम पर बड़े-बड़े पुरस्कार बटोरने की होड़ के पीछे एक ऐसा कड़वा सच छिपा है, जिसे प्रशासनिक फाइलों के नीचे दबाने की पुरज़ोर कोशिश की जा रही थी. शहर के ऊंचे रसूखदार गलियारों में जब अधिकारी और नेता अपनी पीठ थपथपाने और अखबारों में बड़ी-बड़ी तस्वीरें चमकाने में मशरूफ हैं, ठीक उसी वक्त जमीनी हकीकत पर हजारीबाग की जनता और बदहाल सफाई व्यवस्था अपने हाल पर आंसू बहा रही है. दरअसल, नगर निगम की बोर्ड बैठक में शहर को साफ रखने के लिए जिस बड़े और ऐतिहासिक फैसले पर मुहर लगी थी, वह धरातल पर उतरने के बजाय सरकारी दफ्तरों की अलमारियों में धूल फांक रहा है. इस दोहरे रवैये और जनता के साथ हो रहे इस खेल के खिलाफ अब अखिल भारतीय मजदूर संगठन ने पूरी तरह से बिगुल फूंक दिया है.

ब्रांडिंग की चमक और वार्डों का सन्नाटा
इस पूरे मामले का सबसे स्याह पहलू यह है कि नगर निगम प्रशासन जमीनी सुधार करने के बजाय सिर्फ कागजी तौर पर खुद को नंबर वन दिखाने की खानापूरी में जुटा है. नगर निगम यूनियन के अध्यक्ष अधिवक्ता विवेक कुमार वाल्मीकि ने इस पर तीखा तंज कसते हुए साफ कहा है कि कुछ लोगों को सिर्फ तस्वीरें खिंचवाने का शौक है, लेकिन जमीनी हकीकत से उन्हें सख्त परहेज है. जब बोर्ड की उच्च स्तरीय बैठक में यह आधिकारिक तौर पर मान लिया गया था कि हजारीबाग के हर वार्ड में सुचारू सफाई व्यवस्था के लिए भारी संख्या में नियमित सफाई कर्मियों की सख्त जरूरत है, तो फिर इस स्थायी आवश्यकता को ‘मुख्यमंत्री श्रमिक योजना’ के नाम पर महज 90 से 100 दिनों के ठेके पर क्यों टाला जा रहा है? यह सीधे तौर पर जनता की आंखों में धूल झोंकने जैसा है, ताकि कागजों पर सब कुछ चमकता रहे और पीठ थपथपाने का मौका न छूटे, भले ही बाकी दिन वार्डों की जनता कचरे के अंबार के बीच अपनी किस्मत को कोसती रहे.
365 दिन का काम और कृत्रिम ब्रेक का कानूनी उल्लंघन
कानूनी चश्मे से देखें तो यह पूरा खेल सिर्फ लापरवाही का नहीं, बल्कि एक बड़े प्रशासनिक और संवैधानिक उल्लंघन का है. झारखंड नगरपालिका अधिनियम साफ कहता है कि शहर की साफ-सफाई, कचरा उठाव और नाली निकासी कोई पार्ट-टाइम काम नहीं बल्कि एक वैधानिक और अनिवार्य कर्तव्य है, जो साल के 365 दिन निरंतर चलता है. ऐसे बारहमासी काम में ‘मुख्यमंत्री श्रमिक योजना’ जैसी अल्पकालिक व्यवस्था का सहारा लेना औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के तहत सीधे तौर पर अनुचित श्रम अभ्यास और मजदूरों के शोषण की श्रेणी में आता है. देश की सर्वोच्च अदालत ने भी ‘स्टेट ऑफ हरियाणा बनाम प्यारा सिंह’ जैसे कई ऐतिहासिक मुकदमों में साफ कहा है कि स्थायी प्रकृति के काम में कृत्रिम ब्रेक देना पूरी तरह अवैध है. इसके बावजूद हजारीबाग में नियमों को ताक पर रखकर व्यवस्था की आड़ में यह छलावा धड़ल्ले से जारी है.
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चोर दरवाजे से बहाली और बेरोजगारों से विश्वासघात
हैरानी की बात तो यह भी है कि इस पूरी व्यवस्था के भीतर एक गुप्त ‘बैकडोर एंट्री’ का खेल भी पैर पसार चुका है. बिना किसी सार्वजनिक विज्ञापन के, बिना किसी अखबार में विज्ञप्ति जारी किए या बिना नोटिस बोर्ड पर सूचना टांगे, बेहद गुपचुप और मनमाने तरीके से नए कर्मियों की नियुक्तियां की जा रही हैं. यह सीधे तौर पर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का खुला उल्लंघन है, जो देश के हर बेरोजगार युवा को रोजगार का समान अवसर देने की गारंटी देता है. सुप्रीम कोर्ट के ‘उमादेवी’ वाले ऐतिहासिक फैसले की धज्जियां उड़ाते हुए जिस तरह से चोर दरवाजे से नियुक्तियां हो रही हैं, उसने पूरी चयन प्रक्रिया को संदेह के घेरे में ला खड़ा किया है. मुख्यमंत्री श्रमिक योजना, जिसका मूल उद्देश्य संकट के समय शहरी बेरोजगारों को पूरक आजीविका देना था, उसका इस्तेमाल नगर निगम अपने मुख्य बजट को बचाने और जिम्मेदारी से भागने के लिए कर रहा है.
आर-पार की लड़ाई और हाई कोर्ट की सीधी चेतावनी
अब इस प्रशासनिक मनमानी और अधिकारों के हनन के खिलाफ आर-पार की लड़ाई तय हो चुकी है. मजदूर संगठन ने उपायुक्त को सीधे चेतावनी देते हुए मांग की है कि इस गुपचुप तरीके से चल रही चयन प्रक्रिया पर अविलंब उच्च स्तरीय जांच बैठाई जाए और श्रमिक योजना के नाम पर हो रही इस अस्थायी व्यवस्था को तत्काल प्रभाव से रोका जाए. यूनियन ने दोटूक शब्दों में साफ कर दिया है कि अगर जिला प्रशासन ने इस प्रशासनिक मनमानी पर तुरंत संज्ञान लेकर रोक नहीं लगाई, तो वे हजारीबाग के बेरोजगार युवाओं और श्रमिक हितों की रक्षा के लिए सीधे झारखंड उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर करेंगे. साफ है कि आने वाले दिनों में नगर निगम प्रशासन की मुश्किलें बढ़ने वाली हैं, क्योंकि हजारीबाग की जागरूक जनता और मजदूर संगठन अब इस कागजी ब्रांडिंग के आगे घुटने टेकने के मूड में बिल्कुल नहीं हैं.
