Ranchi: झारखंड की राजनीति में जब भी तीसरे विकल्प या क्षेत्रीय अस्मिता की बात होती है, ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन (आजसू) का नाम प्रमुखता से उभरता है. लेकिन बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच पार्टी के सामने अपने वजूद को विस्तार देने की बड़ी चुनौती है. आजसू का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि वह साझेदारी की राजनीति और स्वतंत्र पहचान के बीच कैसे संतुलन बनाती है.
नए राजनीतिक उभार से बढ़ी चुनौती
वहीं झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा (जेएलकेएम) के उभरने से आजसू के पारंपरिक वोट बैंक, विशेषकर युवाओं और महतो-कुर्मी मतदाताओं में सेंधमारी का बड़ा खतरा पैदा हो गया है. यदि आजसू अपने सांगठनिक ढांचे को नए कलेवर में नहीं ढालती है, तो उसे राज्य की राजनीति में केवल एक सहयोगी दल बनकर संतोष करना पड़ सकता है.
BJP की बी-टीम होने का आरोप
लंबे समय तक भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के साथ गठबंधन में रहने के कारण आजसू पर अक्सर बीजेपी की बी-टीम होने का आरोप लगता है. इससे पार्टी की स्वतंत्र पहचान और विस्तार पर असर पड़ता है.
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सीमित भौगोलिक विस्तार
आजसू का प्रभाव अभी भी मुख्य रूप से पंचपरगना क्षेत्र और कुछ चुनिंदा जिलों तक सीमित है. संथाल परगना और कोल्हान के बड़े हिस्सों में पार्टी की उपस्थिति अभी भी सांकेतिक है.
रणनीतिक दुविधा में पार्टी
2019 के विधानसभा चुनाव में अकेले लड़कर पार्टी ने अपनी ताकत तो दिखाई, लेकिन सत्ता से बाहर हो गई. यह दुविधा कि अकेले चलें या बड़े भाई के साथ, पार्टी के कैडर में असमंजस पैदा करती है. 2024 के चुनाव में पार्टी विधानसभा में सिर्फ एक ही सीट जीत पाई.
