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चाईबासा: “हमारा गांव, हमारा राज” के नारे के साथ दुबिल माइंस अनिश्चितकालीन बंद

Chaibasa: हातु-आबुआ राज, ग्राम स्वराज अभियान के तहत ग्राम सभा दुबिल के बैनर तले शुक्रवार 26 जून की सुबह से मनोहरपुर सेल...

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Chaibasa: हातु-आबुआ राज, ग्राम स्वराज अभियान के तहत ग्राम सभा दुबिल के बैनर तले शुक्रवार 26 जून की सुबह से मनोहरपुर सेल ऑर माइंस (चिड़िया-दुबिल) में बड़ा जनआंदोलन शुरू हो गया. सुबह 8 बजे से सैकड़ों ग्रामीणों ने खदान का उत्पादन और लौह अयस्क की माल ढुलाई पूरी तरह ठप कर दी. आंदोलनकारी ग्रामीणों ने साफ ऐलान किया है कि जब तक उनकी चार सूत्री मांगें पूरी नहीं होतीं, तब तक आंदोलन जारी रहेगा. यह आंदोलन केवल रोजगार की लड़ाई नहीं, बल्कि जल-जंगल-जमीन और अस्तित्व की लड़ाई बन चुका है. ग्रामीणों का कहना है कि जिस दुबिल पहाड़ से सेल करोड़ों का लौह अयस्क निकाल रही है, उसी पहाड़ की तलहटी में बसे गांवों दुबिल, छोटानागरा, उसरुईया, पोंगा, सलाई, छोटा जामकुंडिया, बिनुवा, लोडो, टिमरा, चिड़िया, अंकुआ आदि गांवों को आज तक सिर्फ प्रदूषण, बर्बादी और उपेक्षा मिली है.

आदिवासी आस्था, संस्कृति और जमीन पर हमला

आंदोलन का नेतृत्व कर रहे दुलाल आइड ने आरोप लगाया कि दुबिल गांव से महज दो किलोमीटर दूर स्थित सेल की दुबिल माइंस के विस्तार के नाम पर गांव के सरना स्थल, कब्रिस्तान और रैयती जमीन पर अवैध तरीके से पिलर गाड़ दिए गए हैं. यह सीधे-सीधे आदिवासी आस्था, संस्कृति और जमीन पर हमला है. ग्रामीणों का कहना है कि खदान से निकलने वाला लाल पानी और लौह पत्थरों की धूल ने खेत-खलिहानों को पूरी तरह बर्बाद कर दिया है. उपजाऊ जमीन अब बंजर बन चुकी है. गांव के जलस्रोत दूषित हो चुके हैं और पीने के पानी का संकट गहराता जा रहा है. खनन से करोड़ों की कमाई, लेकिन गांव बेरोजगारी और बदहाली में है. ग्रामीणों का सबसे बड़ा आरोप यह है कि उनके गांव की जमीन और संसाधनों से सेल मुनाफा कमा रही है, लेकिन गांव के युवाओं को रोजगार तक नहीं दिया जा रहा. वर्षों से तृतीय और चतुर्थ श्रेणी की बहाली में दुबिल गांव के युवाओं की अनदेखी की गई है. आंदोलनकारियों ने कहा कि सीएसआर के तहत रोजगार, चिकित्सा, शिक्षा और मूलभूत सुविधाओं का जो वादा किया गया था, वह सिर्फ कागजों तक सीमित रहा. गांव में अस्पताल नहीं, रोजगार नहीं, पानी नहीं और शिक्षा की स्थिति भी दयनीय है.

ग्रामसभा का सीधा सवाल: विकास किसका, विनाश किसका?

ग्रामीणों ने सवाल उठाया है कि जब माइंस गांव की जमीन पर है तो विकास का लाभ गांव को क्यों नहीं मिल रहा? आखिर क्यों गांव के लोग प्रदूषण, बीमारी और विस्थापन झेलें और कंपनी सिर्फ मुनाफा कमाए? आंदोलन में शामिल लोगों ने कहा कि यह लड़ाई अब सिर्फ दुबिल गांव की नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के आदिवासियों और ग्रामीणों की अस्मिता की लड़ाई है.

चार सूत्री मांगें बनी संघर्ष की धुरी

ग्रामसभा ने अपनी चार प्रमुख मांगों को आंदोलन की आधारशिला बताया है:

  1. दुबिल गांव के 200 बेरोजगार युवाओं को बीएसएल सेल, सीएसआर और ठेकेदारी कार्यों में खतियान आधारित प्राथमिकता के साथ रोजगार दिया जाए.
  2. गांव की अधिग्रहित जमीन का उचित मुआवजा और प्रभावित परिवारों को रोजगार दिया जाए.
  3. सरना, कब्रिस्तान और रैयती जमीन पर अवैध रूप से गाड़े गए पिलरों को तुरंत हटाया जाए.
  4. गांव में चार नए चापाकल और आठ जलमीनार लगाए जाएं ताकि पेयजल संकट खत्म हो सके.

उत्पादन बंद, प्रबंधन पर दबाव बढ़ा

दुबिल माइंस में उत्पादन बंद होने से सेल प्रबंधन पर दबाव बढ़ गया है. लौह अयस्क की सप्लाई बाधित होने से आर्थिक नुकसान की संभावना भी जताई जा रही है. हालांकि खबर लिखे जाने तक प्रबंधन की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई थी. ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि मांगों की अनदेखी की गई तो आंदोलन और उग्र होगा. उनका कहना है कि अब “वादा नहीं, अधिकार चाहिए.”

जल-जंगल-जमीन की जंग अब निर्णायक मोड़ पर

दुबिल गांव का यह आंदोलन यह दिखाता है कि विकास की चमक के पीछे गांवों का अंधेरा कितना गहरा है. जब तक स्थानीय लोगों को उनका हक नहीं मिलेगा, तब तक ऐसे संघर्ष और तेज होंगे.

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