विनीत आभा उपाध्याय
Ranchi : झारखंड हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले के खिलाफ दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए अपने फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि दो वयस्क लंबे समय तक आपसी सहमति से संबंध में रहे हों तो केवल शादी न होने के आधार पर इसे दुष्कर्म नहीं माना जा सकता. झारखंड हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की एकलपीठ ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376 के तहत निचली अदालत द्वारा सुनाई गई सजा को रद्द करते हुए आरोपी को बरी कर दिया. अभियोजन पक्ष के मुताबिक पीड़िता ने आरोप लगाया था कि आरोपी ने शादी का झूठा वादा कर लगभग पांच वर्षों तक उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए. निचली अदालत ने इसे धोखे से प्राप्त सहमति मानते हुए आरोपी को दोषी ठहराया था. इसके खिलाफ आरोपी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया.

यौन शोषण का आरोप लगाया था
हाईकोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान आरोपी की ओर से दलील दी गई कि दोनों पिछले पांच वर्षों से अपनी स्वेच्छा से रिश्ते में थे और शादी से इनकार करने के बाद ही एफआईआर दर्ज कराई गई. अदालत ने सुनवाई में यह पाया कि घटना के समय पीड़िता की उम्र 30 वर्ष थी. इस केस से जुडी दो अन्य महिलाओं की गवाही से भी यह सिद्ध हुआ कि दोनों के बीच पांच वर्षों से प्रेम संबंध था. उसने मूल शिकायत में पांच वर्षों तक यौन शोषण का आरोप लगाया था जबकि अदालत में गवाही के दौरान केवल दो बार कथित दुष्कर्म की बात कही. मेडिकल रिपोर्ट में पीड़िता को कई वर्षों से यौन संबंध बनाने की अभ्यस्त बताया गया जो लंबे समय से चले आ रहे सहमति के संबंध का संकेत देता है. अदालत ने कहा कि लंबे समय तक आपसी सहमति से बनाए गए शारीरिक संबंध केवल इसलिए दुष्कर्म में नहीं बदल जाते क्योंकि बाद में विवाह संपन्न नहीं हो सका.

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