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77 करोड़ की वसूली रोकने की साजिश बर्दाश्त नहीं, सार्वजनिक धन की रिकवरी हर हाल में होगी : हाईकोर्ट

Ayush Chauhan Ranchi : झारखंड हाईकोर्ट ने देवघर स्थित मां ललिता हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर के करोड़ों रुपये के बैंक ऋण विवाद...

बैंक ऋण

Ayush Chauhan

Ranchi : झारखंड हाईकोर्ट ने देवघर स्थित मां ललिता हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर के करोड़ों रुपये के बैंक ऋण विवाद में बड़ा फैसला सुनाया है. हाईकोर्ट ने कहा है कि सार्वजनिक धन की वसूली को टालने के लिए अपनाई गई कानूनी चालें स्वीकार नहीं की जा सकतीं. अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि डेट रिकवरी अपीलीय न्यायाधिकरण (DRAT) के चेयरपर्सन को प्रशासनिक अधिकारों का इस्तेमाल कर न्यायिक आदेश पारित करने का अधिकार नहीं है. न्यायमूर्ति आनंद सेन की अदालत ने 10 अप्रैल और 21 अप्रैल 2026 को डीआरएटी, इलाहाबाद की ओर से पारित उन अंतरिम आदेशों को रद्द कर दिया. जिनके जरिए नीलाम संपत्ति का सेल सर्टिफिकेट जारी करने पर रोक लगा दी गई थी. हाईकोर्ट ने कहा कि अब बैंक नीलामी खरीदार के पक्ष में सेल सर्टिफिकेट जारी करने के लिए स्वतंत्र है.

अदालत की सख्त टिप्पणी

हाईकोर्ट ने कहा कि उधारकर्ता ने पहले बैंक से समझौता किया. संपत्ति का कब्जा वापस लिया, लेकिन समझौते की शर्तों का पालन नहीं किया. इसके बाद लगातार विभिन्न मंचों पर मुकदमे दायर कर वसूली प्रक्रिया को रोकने की कोशिश की गई. अदालत ने टिप्पणी की कि 77 करोड़ रुपये से अधिक बकाया होने के बावजूद उधारकर्ता अदालत के निर्देश पर 2 करोड़ रुपये तक जमा नहीं कर सका. जिससे उसकी मंशा स्पष्ट होती है. न्यायालय ने कहा कि उधारकर्ता का उद्देश्य सिर्फ वसूली प्रक्रिया को लंबा खींचना है, जबकि यह धन जनता का पैसा है और इसकी वसूली कानून के अनुसार हर हाल में होनी चाहिए.

चेयरपर्सन ने अधिकार क्षेत्र का किया अतिक्रमण

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि रिकवरी ऑफ डेट्स एंड बैंकरप्सी एक्ट की धारा 17A के अनुसार चेयरपर्सन को सिर्फ प्रशासनिक और पर्यवेक्षण संबंधी अधिकार देती है. इस धारा के तहत किसी न्यायिक विवाद पर अंतरिम रोक लगाने या राहत देने का अधिकार नहीं है. अदालत ने कहा कि सेल सर्टिफिकेट जारी करने पर रोक लगाने का आदेश पूरी तरह न्यायिक प्रकृति का थी. जिसे धारा 17A के तहत पारित नहीं किया जा सकता था. इसलिए डीआरएटी का आदेश अधिकार क्षेत्र से परे (Jurisdictional Error) था.

पूरा मामला

इंडियन बैंक (पूर्व में इलाहाबाद बैंक) ने अस्पताल परियोजना के लिए पहले 2 करोड़, फिर 9 करोड़ और बाद में कुल 19.45 करोड़ रुपये का ऋण स्वीकृत किया. ऋण खाते के एनपीए होने के बाद बैंक ने SARFAESI Act के तहत कार्रवाई शुरू की. बाद में समझौता भी हुआ, लेकिन उधारकर्ता ने उसका पालन नहीं किया. इसके बाद बैंक ने लगभग 70.92 करोड़ रुपये की बकाया राशि की वसूली के लिए संपत्ति की नीलामी की. जिसमें 44.22 करोड़ रुपये की बोली प्राप्त हुई.

हाईकोर्ट का अंतिम आदेश

हाईकोर्ट ने डीआरएटी के दोनों अंतरिम आदेशों को निरस्त करते हुए बैंक और नीलामी खरीदार की याचिकाएं स्वीकार कर ली. अदालत ने स्पष्ट किया कि अब नीलामी खरीदार के पक्ष में सेल सर्टिफिकेट जारी करने में कोई कानूनी बाधा नहीं है.

 

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