Hazaribagh: सदर अस्पताल सह मेडिकल कॉलेज की बिजली व्यवस्था को लेकर दो महीने पहले जिला विकास समन्वय एवं निगरानी समिति, दिशा की बैठक में जनप्रतिनिधियों ने सवाल उठाए थे. बैठक में अस्पताल की स्वास्थ्य व्यवस्था के साथ बिजली और अन्य बुनियादी सुविधाओं को दुरुस्त करने पर जोर दिया गया था. इसके बावजूद दो महीने बाद भी स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं दिख रहा है.

टॉर्च या मोबाइल की रोशनी बन रही सहारा
अस्पताल में बिजली कटने के बाद मरीजों और उनके परिजनों को अंधेरे में रहना पड़ रहा है. कई जगह टॉर्च या मोबाइल की रोशनी ही सहारा बन रही है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब जिले की महत्वपूर्ण समीक्षा बैठक में सदर अस्पताल जैसी संवेदनशील जगह की समस्या उठाई जाती है और प्रशासनिक स्तर पर सुधार के निर्देश दिए जाते हैं, तो फिर जमीनी स्तर पर इसका असर क्यों नहीं दिख रहा है.
‘दिशा’ बैठक में स्वास्थ्य और बिजली व्यवस्था पर हुई थी चर्चा
30 मई को हुई दिशा की बैठक में जिले की विकास योजनाओं के साथ पेयजल, स्वास्थ्य और बिजली व्यवस्था को लेकर भी चर्चा हुई थी. बैठक में केंद्रीय मंत्री अन्नपूर्णा देवी, हजारीबाग सांसद मनीष जायसवाल, सदर विधायक प्रदीप प्रसाद सहित जनप्रतिनिधि और जिले के अधिकारी मौजूद थे. बैठक में जनहित से जुड़े मुद्दों की समीक्षा करते हुए संबंधित विभागों को व्यवस्था में सुधार के निर्देश दिए गए थे. इसके बाद 11 जून की स्वास्थ्य समीक्षा बैठक में उपायुक्त हेमंत सती ने अस्पताल की बिजली व्यवस्था सहित मरीजों की सुविधाओं को दुरुस्त करने की जरूरत पर जोर दिया था. अस्पताल परिसर में सोलर व्यवस्था, पंखे, कूलर और अन्य बुनियादी सुविधाओं को लेकर भी सुधार के निर्देश दिए गए थे.
डीसी की समीक्षा के बावजूद समस्या बरकरार
डीसी हेमंत सती के नेतृत्व में स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर लगातार समीक्षा की गई है, स्वास्थ्य विभाग की समीक्षा बैठक में सदर अस्पताल की सुविधाओं को मजबूत करने के साथ ब्लड सेपरेटर मशीन की स्थापना को मंजूरी भी दी गई थी. इससे साफ है कि जिला प्रशासन अस्पताल की स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने को लेकर योजनाएं और निर्देश जारी कर रहा है. लेकिन बिजली जैसी बुनियादी जरूरत का समाधान अब भी चुनौती बना हुआ है. अस्पताल में बिजली गुल होने पर मरीजों को अंधेरे का सामना करना पड़ता है, ऐसे में सवाल उठता है कि करोड़ों रुपये की स्वास्थ्य सुविधाओं वाले अस्पताल में निर्बाध बिजली जैसी प्राथमिक व्यवस्था सुनिश्चित क्यों नहीं हो पा रही है.
जनरेटर की व्यवस्था, फिर भी मरीजों को अंधेरे से गुजरना पड़ रहा
अस्पताल में बिजली आपूर्ति बाधित होने पर जनरेटर की व्यवस्था वैकल्पिक स्रोत के रूप में की गई है, लेकिन मरीजों और परिजनों की शिकायत है कि बिजली जाने के दौरान हर जगह तत्काल बैकअप उपलब्ध नहीं हो पाता. जनरेटर के संचालन के लिए डीजल की व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं. बिजली का संकट महज असुविधा नहीं है, रात के समय भर्ती मरीज, प्रसव के लिए पहुंचने वाली महिलाएं, बुजुर्ग और गंभीर मरीज इससे सीधे प्रभावित होते हैं. डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मियों को भी कई बार सीमित रोशनी में काम करना पड़ सकता है, ऐसी स्थिति अस्पताल की सुरक्षा और इलाज की गुणवत्ता दोनों के लिए चिंता का विषय है.
बैठकों से आगे बढ़कर जवाबदेही तय करने की जरूरत
सदर अस्पताल जिले का प्रमुख सरकारी अस्पताल है, जहां रोज बड़ी संख्या में गरीब और मध्यमवर्गीय मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं, ऐसे मरीज निजी अस्पतालों का खर्च वहन करने में सक्षम नहीं होते, उनके लिए सरकारी अस्पताल ही सबसे बड़ा सहारा है ऐसे में अस्पताल में अंधेरा होना केवल बिजली की समस्या नहीं, बल्कि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़ा करता है, जब दिशा की बैठक में जनप्रतिनिधि समस्या उठाते हैं, डीसी स्तर से स्वास्थ्य व्यवस्था की समीक्षा होती है और विभागीय अधिकारियों को सुधार के निर्देश दिए जाते हैं, तो उसके बाद जमीनी स्तर पर क्या कार्रवाई हुई, इसकी जवाबदेही भी तय होनी चाहिए
बड़ा सवाल
दो महीने पहले उठाई गई समस्या के बावजूद यदि सदर अस्पताल में बिजली व्यवस्था पूरी तरह सुचारु नहीं हो पाई है, तो यह सवाल स्वाभाविक है कि दिशा की बैठक और प्रशासनिक समीक्षा में दिए गए निर्देशों का कितना अनुपालन हुआ. अब जरूरत केवल बैठकों और निर्देशों की नहीं, बल्कि अस्पताल में स्थायी और निर्बाध बिजली व्यवस्था सुनिश्चित करने की है.
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