Ranchi: झारखंड में जल जीवन मिशन (जेजेएम), डीएमएफटी और स्टेट प्लान के तहत संचालित कई महत्वपूर्ण ग्रामीण जलापूर्ति योजनाओं की धीमी प्रगति को लेकर पेयजल एवं स्वच्छता विभाग अब गंभीर हो गया है. विभाग के अभियान निदेशक शशि रंजन ने 26 मई 2026 को जारी पत्र में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि संवेदक श्रीराम ईपीसी की तरफ से संचालित योजनाओं की प्रगति अत्यंत धीमी है. कई जगहों पर काम लगभग ठप हो चुका है. स्थिति इतनी गंभीर है कि विभागीय सचिव की अध्यक्षता में विशेष समीक्षा बैठक बुलाकर संबंधित अभियंताओं से विस्तृत प्रतिवेदन मांगा गया है.

हजारीबाग, चतरा, धनबाद और देवघर से मांगी गयी है रिपोर्ट
जारी पत्र में साफ कहा गया है कि संवेदक ने योजनाओं के कार्य में अपेक्षित रुचि नहीं ली है. जिस वजह से जलापूर्ति जैसी आवश्यक जनसेवा प्रभावित हो रही है और विभाग की छवि भी धूमिल हो रही है. यही कारण है कि चाईबासा, हजारीबाग, चतरा, धनबाद और मधुपुर समेत कई प्रमंडलों के अभियंताओं को विस्तृत रिपोर्ट के साथ उपस्थित होने का निर्देश दिया गया है.
2.42 लाख घरों को पानी पहुंचाने का लक्ष्य
विभागीय दस्तावेजों के अनुसार श्रीराम ईपीसी को विभिन्न जिलों में लगभग 2.42 लाख घरेलू नल कनेक्शन (एफएचटीसी) उपलब्ध कराने का लक्ष्य दिया गया था. इसके विरुद्ध मार्च 2026 तक केवल 33,556 कनेक्शन ही दिए जा सके हैं. अर्थात कुल लक्ष्य का करीब 14 प्रतिशत काम ही पूरा हो पाया है. सबसे बड़ी बात यह है कि कंपनी को आवंटित प्रमुख योजनाओं में से एक भी योजना पूर्ण रूप से पूरी नहीं हुई है. अधिकांश योजनाएं वर्षों से “अंडर कंस्ट्रक्शन” की स्थिति में हैं, जबकि कई योजनाओं की निर्धारित पूर्णता अवधि समाप्त हुए काफी समय बीत चुका है.
वर्षों से अधूरी हैं बड़ी योजनाएं
दस्तावेजों के अनुसार चाईबासा की आइता और पुराना चाईबासा जलापूर्ति योजना वर्ष 2019 में शुरू हुई थी और अगस्त 2022 तक पूरी होनी थी. लगभग 94 करोड़ रुपये इस योजना का कार्य अभी तक पूरा नहीं हुआ है. इसी तरह तांतनगर फुल ब्लॉक कवरेज जलापूर्ति योजना भी निर्धारित अवधि समाप्त होने के बावजूद अधूरी है. हजारीबाग के चौपारण नॉर्थ एवं साउथ तथा बरही पार्ट RWSS में भारी राशि खर्च होने के बावजूद प्रगति अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंची है. चतरा की टंडवा फुल ब्लॉक कवरेज योजना, धनबाद की गोविंदपुर-निरसा मल्टी विलेज योजना, बाघमारा-अदज गांव जलापूर्ति योजना तथा मधुपुर की मारगोमुंडा मेगा आरडब्ल्यूएसएस जैसी परियोजनाएं भी वर्षों से अधूरी पड़ी हैं.
कई योजनाओं में निर्धारित लक्ष्य के मुकाबले नल कनेक्शन शून्य या नगण्य हैं, जबकि करोड़ों रुपये का भुगतान हो चुका है.
पहले डिबार, फिर मिला करोड़ों का काम
श्रीराम ईपीसी को लेकर सबसे बड़ा सवाल यह है कि कंपनी का रिकॉर्ड पहले से विवादों में रहा है. तांतनगर जलापूर्ति योजना में कथित अनियमितताओं और कार्य निष्पादन में गंभीर खामियां सामने आने के बाद विभाग ने कंपनी को डिबार किया था. हालांकि बाद में डिबार की सूची से इसे हटा दिया गया. दोबारा से कंपनी को फिर से लगभग 800 करोड़ रुपये से अधिक की योजनाओं का कार्य सौंप दिया गया. अब वही योजनाएं विभाग के लिए परेशानी का कारण बन रही हैं. कंपनी को दोबारा इतना बड़ा कार्यादेश दिए जाने की प्रक्रिया भी जांच के दायरे में है. यह सवाल उठ रहा है कि खराब ट्रैक रिकॉर्ड वाली कंपनी को आखिर किस आधार पर इतनी बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई.
जुडको ने भी की कार्रवाई
धनबाद क्षेत्र की जलापूर्ति योजनाओं में गंभीर लापरवाही और कार्य निष्पादन में अनियमितताओं के आरोपों के बाद जुडको (JUIDCO) ने भी कंपनी के खिलाफ डिबार की कार्रवाई की है. इसके अलावा कंपनी को दिए गए विभिन्न कार्यों की गुणवत्ता, भुगतान और प्रगति की अलग-अलग स्तर पर जांच चल रही है. जांच में कई ऐसी योजनाओं का भी उल्लेख सामने आया है, जहां कार्य प्रगति की तुलना में अधिक भुगतान किए जाने की शिकायतें मिली हैं. भुगतान और भौतिक प्रगति के बीच अंतर की जांच की जा रही है.
टाइम एक्सटेंशन दिलाने की हो रही है कोशिश
विभाग के भीतर यह चर्चा भी जोर पकड़ रही है कि कंपनी की लगातार विफलताओं के बावजूद कुछ जिम्मेदार अधिकारी उसे अतिरिक्त समय (टाइम एक्सटेंशन) दिलाने की कोशिश में जुटे हैं. आरोप है कि कंपनी की ओर से विभाग के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों को प्रभावित कर समय विस्तार हासिल करने का प्रयास किया जा रहा है. हालांकि विभाग के शीर्ष स्तर पर इस मामले को लेकर अलग सोच दिखाई दे रही है. सूत्रों के अनुसार विभागीय मंत्री, सचिव और अभियंता प्रमुख इस बात पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं कि वर्षों से लंबित परियोजनाओं का शेष कार्य किसी सक्षम एजेंसी को सौंपकर जल्द पूरा कराया जाए, ताकि ग्रामीण क्षेत्रों को पेयजल उपलब्ध कराया जा सके.
हाईकोर्ट तक पहुंचा मामला
कंपनी को आवंटित परियोजनाओं, भुगतान, कार्य प्रगति और अनुबंध संबंधी विवादों का मामला अब न्यायिक स्तर तक पहुंच चुका है. कई मामलों में कानूनी लड़ाई चल रही है और प्रकरण झारखंड हाईकोर्ट तक पहुंच गया है.
