Ranchi: झारखंड शिक्षक पात्रता परीक्षा (JTET) 2026 में कई क्षेत्रीय और जनजातीय भाषाओं को शामिल नहीं किए जाने का मामला अब राजनीतिक और सांस्कृतिक बहस का विषय बनता जा रहा है. राज्य की मंत्री दीपिका पांडेय सिंह ने इस मुद्दे को गंभीर बताते हुए झारखंड कांग्रेस प्रभारी के. राजू को लिखित सुझाव सौंपा है.
अंगिका, भोजपुरी और मगही को लेकर उठाए सवाल
उन्होंने अपने पत्र में कहा कि पूर्व में आयोजित JTET परीक्षाओं में अंगिका, भोजपुरी और मगही जैसी भाषाओं को क्षेत्रीय भाषा के रूप में मान्यता दी गई थी, लेकिन 2026 की अधिसूचना में इन्हें बाहर रखा गया है. उनका कहना है कि झारखंड जैसे बहुभाषी राज्य में भाषाई विविधता को नजरअंदाज करना युवाओं और स्थानीय संस्कृति दोनों के साथ अन्याय है.

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जनजातीय भाषाओं की अनदेखी पर भी चिंता
दीपिका पांडेय सिंह ने यह भी सवाल उठाया कि जनजातीय भाषाओं की सूची में असुर, बिरहोर और माल्टो जैसी भाषाओं को स्थान नहीं दिया गया, जबकि ये झारखंड की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. उन्होंने संथाल परगना में कुरमाली भाषा को शामिल नहीं किए जाने पर भी आपत्ति जताई और कहा कि लाखों लोग इस भाषा का प्रयोग करते हैं.
भाषाई संरक्षण के लिए संवेदनशील नीति की मांग
उन्होंने सुझाव दिया कि सरकार को केवल परीक्षा आयोजन तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि क्षेत्रीय और जनजातीय भाषाओं के संरक्षण और प्रोत्साहन की दिशा में संवेदनशील नीति बनानी चाहिए. उनके अनुसार, यदि स्थानीय भाषाओं को प्रतियोगी परीक्षाओं से बाहर रखा जाएगा, तो नई पीढ़ी का इन भाषाओं से जुड़ाव कमजोर पड़ सकता है.
संशोधित व्यवस्था लागू करने की मांग
मंत्री ने मांग की कि JTET 2026 में सभी प्रमुख क्षेत्रीय और जनजातीय भाषाओं को शामिल करते हुए संशोधित व्यवस्था लागू की जाए, ताकि राज्य की भाषाई पहचान और सांस्कृतिक विरासत को उचित सम्मान मिल सके.
