विनीत आभा उपाध्याय

Ranchi: झारखंड के बोकारो जिले के चास थाना क्षेत्र के तेतुलिया मौजा में करीब 95.65 एकड़ संरक्षित वन भूमि को फर्जी कागजात और गहरे षड्यंत्र के जरिए निजी संपत्ति बनाकर बेचने के एक बड़े लैंड स्कैम का पर्दाफाश हुआ है. CID की जांच में इस पूरे फर्जीवाड़े की परतें खुली हैं. CID ने अपनी जांच में यह पाया है कि खतियान के मुताबिक तेतुलिया मौजा के प्लॉट संख्या 426, 450, 483, 554 और 479 (कुल 95.65 एकड़) की जमीन जंगल-झाड़ी के रूप में दर्ज थी. वर्ष 1947 में बिहार प्राइवेट फॉरेस्ट एक्ट और 1958 में भारतीय वन अधिनियम की धारा 29 के तहत इसे संरक्षित वन भूमि घोषित किया गया था.
BSL ने इस 95.65 एकड़ जमीन का उपयोग नहीं किया
वर्ष 1962 में बोकारो स्टील प्लांट (BSL) के टाउनशिप निर्माण के लिए जमीन हस्तांतरित की गई थी. हालांकि, बीएसएल ने इस 95.65 एकड़ जमीन का उपयोग नहीं किया और इसे वापस वन विभाग को सौंपने के लिए पत्राचार किया. लेकिन औपचारिक हस्तांतरण न हो पाने का फायदा भू-माफियाओं ने उठाया. वर्ष 2012 के आसपास मुख्य आरोपियों इजहार हुसैन और अख्तर हुसैन ने आपराधिक षड्यंत्र रचकर खुद को समीर महतो नामक व्यक्ति का वंशज बताया. उन्होंने दावा किया कि समीर महतो ने 23 अक्टूबर 1933 को पुरुलिया के लैंड डिप्टी कलक्टर से नीलामी (Sale Certificate No. 191/1933) के जरिए यह जमीन खरीदी थी.
कथित नीलामकर्ता की उम्र महज नौ साल थी
CID और अदालती दस्तावेजों के अनुसार, जिस 1933 की नीलामी का दावा किया गया उस समय कथित नीलामकर्ता की उम्र महज नौ साल थी. इतना ही नहीं, जिस जमीन के सरेंडर सर्टिफिकेट की तारीख 25 नवंबर 1933 थी, उसकी नीलामी 20 अक्टूबर 1933 को ही दिखा दी गई, जो कानूनन असंभव है. जब वन विभाग ने पुरुलिया (पश्चिम बंगाल) के जिला रजिस्ट्रार से सेल सर्टिफिकेट की जांच कराई, तो पता चला कि जिस वॉल्यूम नंबर 58 में 1933 की मूल डीड दर्ज थी, वही रिकॉर्ड रूम से गायब है. इसके अलावा आवेदन पत्र और सर्च रजिस्टर के पन्ने तक नष्ट कर दिए गए थे.
शेल कंपनी बनाकर 10.3 करोड़ का फर्जी लेन-देन किया गया
जिला मजिस्ट्रेट पुरुलिया ने स्पष्ट किया कि कार्यालय में इस दस्तावेज का कोई रिकॉर्ड मौजूद नहीं है. सबसे चौंकाने वाली बात यह सामने आई कि शेल कंपनी बनाकर 10.3 करोड़ का फर्जी लेन-देन किया गया और फर्जी टाइटल तैयार करने के बाद आरोपी शैलेश कुमार सिंह ने पावर ऑफ अटॉर्नी हासिल की. इसके बाद 10 फरवरी 2021 को इस पूरी जमीन को उमाआयुष मल्टीकॉम प्राइवेट लिमिटेड नामक कंपनी को बेच दिया गया. यह कंपनी जमीन की रजिस्ट्री से मात्र 20 दिन पहले बनाई गई थी, जिसकी पेड कैपिटल केवल कुछ लाख रुपये थी और कंपनी के निदेशक शैलेश सिंह के बेटे व रिश्तेदार थे. कागजों पर 10.3 करोड़ रुपये का भुगतान चेक के माध्यम से दिखाया गया, जो पूरी तरह से संदेहास्पद और फर्जी पाया गया. धनबाद जिले के सेटलमेंट ऑफिसर समक्ष भी फर्जी हस्ताक्षर कर 10 डिसमिल जमीन को बढ़ाकर 74.38 एकड़ कर दिया गया था.

