Ranchi/Dhanbad: देश की सबसे बड़ी नदी प्रणाली गंगा बेसिन पर एक बड़ा पर्यावरणीय संकट मंडरा रहा है. IIT-ISM धनबाद के पर्यावरण विज्ञान एवं इंजीनियरिंग विभाग द्वारा किए गए एक विस्तृत शोध में खुलासा हुआ है कि पिछले 50 वर्षों में गंगा बेसिन से जुड़ी लगभग 18 लाख प्राकृतिक जलधाराएं खत्म हो चुकी हैं. आंकड़ों के अनुसार हर दिन औसतन 99 छोटी जलधाराएं विलुप्त हो रही हैं, जो भविष्य के जल संकट की गंभीर चेतावनी मानी जा रही है. शोध में यह भी सामने आया है कि झारखंड का महत्वपूर्ण दामोदर नदी बेसिन सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों में शामिल है, जहां करीब 70 प्रतिशत प्राकृतिक जलधाराएं या तो समाप्त हो चुकी हैं या खत्म होने के कगार पर पहुंच गई हैं.
यह भी पढ़ें: धनबाद: फर्जी दस्तावेज पर ECL में नौकरी दिलाने के मामले की जांच तेज, शिकायतकर्ता के घर पहुंची ACB की टीम

यह अध्ययन IIT-ISM के प्रोफेसर अंशुमाली और उनकी टीम का
यह अध्ययन IIT-ISM के प्रोफेसर अंशुमाली और उनकी टीम ने किया. शोध के दौरान झारखंड, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की सात छोटी नदियों और 56 वाटरशेड क्षेत्रों का वैज्ञानिक विश्लेषण किया गया. ये सभी जल स्रोत आगे चलकर गंगा नदी प्रणाली से जुड़ते हैं. रिपोर्ट के मुताबिक बीते पांच दशकों में करीब 10 लाख किलोमीटर लंबी प्राकृतिक जलधाराएं समाप्त हो गई हैं. पहले जहां प्रति वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में लगभग 2 किलोमीटर जल निकास तंत्र मौजूद था, वहीं अब यह घटकर केवल 0.9 किलोमीटर रह गया है. वैज्ञानिकों के अनुसार यह गिरावट केवल नदियों का सिकुड़ना नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिक संतुलन के कमजोर होने का संकेत है. विशेषज्ञों ने इसके पीछे अनियंत्रित खनन, जंगलों की कटाई, कृषि विस्तार, अवैध रेत खनन और तेजी से हो रहे सड़क व इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण को मुख्य वजह बताया है. शोधकर्ताओं का कहना है कि प्राकृतिक जलधाराओं के खत्म होने से नदियों की जल धारण क्षमता कम हो रही है, जिससे बाढ़ और सूखे जैसी स्थितियां अधिक खतरनाक बनती जा रही हैं.
यह भी पढ़ें: रांची में सजी शतरंज की बिसात, पहली चाल के साथ शुरू हुई जिला चैम्पियनशिप 2026
![]()
प्रोफेसर अंशुमाली ने क्या दी चेतावनी?
प्रोफेसर अंशुमाली ने चेतावनी देते हुए कहा कि इसका असर अब सीधे पर्यावरणीय आपदाओं के रूप में दिखाई देने लगा है. बादल फटना, फ्लैश फ्लड, भूजल स्तर में गिरावट, भूस्खलन और कई इलाकों में मरुस्थलीकरण जैसी घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं. उन्होंने कहा कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में देश को गंभीर जल संकट का सामना करना पड़ सकता है. शोध में यह भी कहा गया है कि देश में अभी तक नदी बेसिनों और प्राकृतिक जलधाराओं के नुकसान का कोई व्यापक सरकारी डेटा मौजूद नहीं है. वैज्ञानिकों ने नदियों को बचाने के लिए “रिवर रेड लिस्ट” लागू करने, संवेदनशील क्षेत्रों में भूमि संरक्षण नीति बनाने और जलधाराओं की निगरानी के लिए विशेष सेंटर ऑफ एक्सीलेंस स्थापित करने की मांग की है.
