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बंगाली स्वाद से सत्ता का द्वार? ‘झालमुड़ी’ और ‘माछ-भात’ के जरिए बीजेपी का ‘मिशन बंगाल’

  RANCHI: पश्चिम बंगाल की राजनीति हमेशा से ही संस्कृति, भाषा और भावनाओं के इर्द-गिर्द घूमती रही है. लेकिन 2026 के विधानसभा...

 

RANCHI: पश्चिम बंगाल की राजनीति हमेशा से ही संस्कृति, भाषा और भावनाओं के इर्द-गिर्द घूमती रही है. लेकिन 2026 के विधानसभा चुनाव में एक नया ही रंग देखने को मिल रहा है-पेट से दिल तक का सफर. जहां एक तरफ रैलियों में तीखे वार हो रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ बीजेपी के दिग्गज नेता बंगाल के स्थानीय जायके का लुत्फ उठाकर लोगों के दिलों में जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं.

पीएम मोदी का ‘झालमुड़ी’ ब्रेक: सियासत में सादगी का तड़का

हाल ही में झाड़ग्राम में एक रैली के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का काफिला अचानक एक छोटी सी दुकान पर रुक गया. पीएम मोदी को वहां की मशहूर झालमुड़ी खाते हुए देखा गया. सफेद कुर्ता और बीजेपी के चुनाव चिन्ह वाले स्कार्फ में सजे पीएम ने न केवल खुद झालमुड़ी का आनंद लिया, बल्कि वहां मौजूद स्थानीय लोगों के साथ उसे साझा भी किया.

रणनीति: यह कदम सीधे तौर पर उन आरोपों का जवाब माना जा रहा है जिसमें बीजेपी को “बाहरी” और “गैर-बंगाली” विचारधारा वाली पार्टी बताया जाता है.

चंपई सोरेन और माछ-भात का संदेश

झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और बीजेपी नेता चंपई सोरेन भी बंगाल के चुनावी मैदान में सक्रिय हैं. उन्हें स्थानीय कार्यकर्ताओं के साथ बैठकर पारंपरिक माछ-भात खाते हुए देखा गया. बंगाल में मछली का स्थान केवल भोजन नहीं, बल्कि एक पहचान है.

सांस्कृतिक जुड़ाव: टीएमसी अक्सर बीजेपी पर ‘शाकाहारी थोपने’ का आरोप लगाती रही है. चंपई सोरेन का मछली खाना यह संदेश देता है कि बीजेपी बंगाल की खान-पान की परंपराओं का पूरा सम्मान करती है.

बीजेपी की नई रणनीति: ‘लोकल के लिए वोकल’

इस चुनाव में बीजेपी ने केवल भाषणों तक खुद को सीमित नहीं रखा है. पार्टी के अन्य नेता भी इस ‘फूड कार्ड’ को खेल रहे हैं:

  • बिधाननगर के बीजेपी उम्मीदवार मछली लेकर प्रचार करते नजर आए.
  • पांडेश्वर में बीजेपी प्रत्याशी ने ‘मछली जुलूस’ निकाला, जिसमें कार्यकर्ता टोकरियों में मछली लेकर चले.

क्या होगा असर?

लोगों का कहना है कि बीजेपी इस बार ‘बंगाल विरोधी’ होने के टैग को पूरी तरह धो देना चाहती है. जब देश का प्रधानमंत्री सड़क किनारे खड़े होकर झालमुड़ी खाता है, तो वह एक आम बंगाली परिवार से सीधा संवाद स्थापित करता है. यह ‘अपनेपन’ का एहसास दिलाने की एक सोची-समझी कोशिश है.

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