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कागजों पर ‘स्वच्छ’ हुआ हजारीबाग, अधूरे शौचालय और फर्जीबाड़ा की कड़वी दास्तां

Hazaribagh: जब सरकार दिल्ली और रांची से विकास के दावे करती है, तो हजारीबाग के गांवों में कुछ और ही खिचड़ी पक...

Hazaribagh: जब सरकार दिल्ली और रांची से विकास के दावे करती है, तो हजारीबाग के गांवों में कुछ और ही खिचड़ी पक रही होती है. फाइलों में दर्ज आंकड़े बताते हैं कि हर घर में शौचालय बन चुके हैं, लेकिन हकीकत यह है कि लाभुक आज भी उस सरकारी ‘डब्बे’ के बाहर खड़े हैं जिसमें न दरवाजा है और न ही छत.

सिस्टम की जादुईकलम: ₹2000 में बना दिया ₹8600 का काम

यह किसी जादू से कम नहीं है कि 9600  रुपये की लागत वाली योजना को महज 100/110 ईंट और एक बोरा सीमेंट में ‘पूर्ण’ दिखा दिया गया. ग्रामीणों का आरोप है कि दारू और इचाक जैसे प्रखंडों में भ्रष्टाचार का ऐसा ‘मास्टरमाइंड नेटवर्क’ सक्रिय है, जो सरकारी खजाने को दीमक की तरह चाट रहा है. कहीं पुराने टूटे शौचालयों पर नया रंग पोतकर राशि निकाल ली गई, तो कहीं बिना गड्ढा खोदे ही भुगतान हो गया.

मास्टर मनीष बाबूका रहस्य और ट्रेजरी का खेल

विभागीय गलियारों में इन दिनों एक ही नाम की गूंज है— “मास्टर मनीष बाबू”. कहा जा रहा है कि यही वह ‘लिंक’ है जो कागजी प्रक्रिया और भुगतान सिस्टम के बीच का पुल बना हुआ है. ट्रेजरी स्तर से हो रहे संदिग्ध भुगतान और फर्जी हस्ताक्षरों ने यह साफ कर दिया है कि यह लूट केवल निचले स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके तार ऊपर तक जुड़े हो सकते हैं.

ग्रामीणों की चेतावनी “कागज की नाव से विकास नहीं होगा”

ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन भले ही नए SOP और निगरानी का ढोल पीटे, लेकिन जब तक जिम्मेदार अधिकारियों पर डंडा नहीं चलेगा, तब तक जमीन पर कुछ नहीं बदलेगा. यदि इस पूरे खेल की उच्चस्तरीय जांच हुई, तो यह हजारीबाग का अब तक का सबसे बड़ा घोटाला साबित हो सकता है.

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