Hazaribagh: एक तरफ जहां मंचों से महिला सशक्तिकरण और मातृत्व अधिकारों पर बड़ी-बड़ी बातें की जाती हैं, वहीं दूसरी तरफ हजारीबाग का जिला शिक्षा अधीक्षक कार्यालय शिक्षिकाओं को उनके संवैधानिक अधिकारों से वंचित कर सवालों के घेरे में आ गया है. जिले में पिछले करीब एक साल से जरूरतमंद महिला शिक्षकों को चाइल्ड केयर लीव देने से साफ इनकार किया जा रहा है. आलम यह हो चुका है कि दफ्तर के नकारात्मक रवैये को देखते हुए कई शिक्षिकाओं ने अब छुट्टी के लिए आवेदन देना ही बंद कर दिया है, क्योंकि उन्हें अच्छी तरह मालूम है कि उनका आवेदन बिना वजह खारिज ही होना है.
पूरे जिले की शिक्षिकाओं को दी जा रही सजा
बताया जाता है कि विगत में अवकाश के दुरुपयोग की कथित आशंका या कुछ छिटपुट मामलों का हवाला देकर पूरे जिले की शिक्षिकाओं के संवैधानिक अधिकार पर ही ताला लगा दिया गया है. सवाल यह खड़ा होता है कि यदि एकाध लोगों ने नियमों की अनदेखी की भी थी, तो जांच कराकर उन पर कार्रवाई की जानी चाहिए थी, न कि उसकी सजा जिले की तमाम ईमानदार शिक्षिकाओं को दी जाए. एक-दो प्रतिशत की कथित गलती की कीमत 99 फीसदी जरूरतमंद शिक्षिकाएं क्यों चुकाएं? नाम न छापने की शर्त पर पीड़ित शिक्षिकाओं ने बताया कि बच्चों की देखभाल के लिए दिए गए आवेदनों को बिना किसी ठोस कारण के खारिज कर दिया जाता है.
720 दिनों का विधिक अधिकार
सेवा नियमों के स्पष्ट प्रावधानों के अनुसार, 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की देखभाल के लिए शिक्षिकाओं को अपने पूरे सेवाकाल के दौरान 720 दिनों की सवैतनिक ‘चाइल्ड केयर लीव’ पाने का कानूनी अधिकार है. नियमानुसार एक बार में कम से कम 15 दिनों का अवकाश मंजूर किया जा सकता है. इसके बावजूद हजारीबाग में शिक्षिकाओं को इस अधिकार से बेदखल रखा जा रहा है. नौकरी जाने या विभागीय कार्रवाई के खौफ से शिक्षिकाएं खुलकर बोल भी नहीं पा रही हैं और अपने नवजात या छोटे बच्चों व नौकरी की जिम्मेदारी के बीच गंभीर मानसिक तनाव झेलने को मजबूर हैं.
शिक्षक संघ ने उठाए सवाल
इस पूरे प्रशासनिक रवैये पर कड़ा ऐतराज जताते हुए झारखंड प्राथमिक शिक्षक संघ के जिलाध्यक्ष मो.अतिकुज्जा ने कहा कि हमारे समाज में महिलाओं को देवी और शक्ति का रूप बताकर सम्मान देने का दावा किया जाता है, लेकिन जब उनके संवैधानिक अधिकारों की बात आती है तो उन्हें मानसिक प्रताड़ना दी जाती है. उन्होंने कहा कि मातृत्व के सम्मान का दावा तभी सच्चा साबित होगा जब शिक्षिकाओं को बिना किसी भेदभाव के उनका हक मिलेगा. अब देखना यह है कि क्या डीएसई कार्यालय अपनी हटधर्मिता छोड़कर जरूरतमंद माताओं को उनका कानूनी अधिकार लौटाएगा या हजारीबाग में चाइल्ड केयर लीव केवल एक अधूरा सपना ही बना रहेगा.
